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लखनऊ विश्वविद्यालय में बढ़ती हिंसा को लेकर प्रॉक्टोरियल बोर्ड से मिला संयुक्त छात्र मोर्चा

लाइव सत्यकाम न्यूज, लखनऊ : संयुक्त छात्र मोर्चा का प्रतिनिधिमंडल प्रॉक्टर कार्यालय में प्रॉक्टोरियल बोर्ड से मिला। आइसा, बाप्सा, एनएसयूआई और एससीएस के प्रतिनिधियों ने पिछले पंद्रह नवंबर को हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रॉक्टोरियल बोर्ड द्वारा दिए गए आश्वासनों पर फॉलो अप लिया। उस दिन बोर्ड ने स्पष्ट रूप से कहा था कि इकॉनॉमिक्स विभाग के दलित शोधार्थी को थप्पड़ मारने वाले सहायक प्रोफेसर राहुल पांडे के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। लेकिन प्रदर्शन के बाद हमने जिस चीज़ को होते देखा, वह कार्रवाई नहीं बल्कि आरोपी को बचाने के लिए की गई राजनीतिक चालबाजी थी।

प्रॉक्टोरियल बोर्ड का आधिकारिक तर्क यह है कि संबंधित छात्र उनकी कार्रवाई से संतुष्ट है और हम जैसे लोग तीसरे पक्ष के रूप में विश्वविद्यालय का वातावरण बिगाड़ रहे हैं। संयुक्त छात्र मोर्चा इस तर्क को पूरी तरह अस्वीकार करता है। हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने वालों को समस्या बताना और अत्याचार के खिलाफ खड़े लोगों को वातावरण बिगाड़ने वाला कहना एक राजनीतिक चाल है। हम यह नहीं मानते कि यह मामला दो लोगों के बीच सुलह होने से समाप्त हो गया। सवाल केवल एक थप्पड़, एक शिक्षक या एक शोधार्थी का नहीं है। सवाल यह है कि क्या सामान्य छात्र इस परिसर में खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं जब पिछले तीन वर्षों में लखनऊ विश्वविद्यालय लगातार हिंसा की घटनाओं से गुजरा है।

वर्ष 2022 से 2025 तक हुई हिंसा की घटनाएँ दर्ज हैं, मीडिया में सामने आई हैं और वीडियो प्रमाणों सहित उपलब्ध हैं। प्रॉक्टोरियल बोर्ड इन घटनाओं को अपराधियों की करतूत बताकर अपनी ज़िम्मेदारी से बचना चाहता है। हमारा मानना है कि जिन तत्वों को बोर्ड अपराधी कहता है, वही तत्व लगातार सक्रिय इसलिए रह पाते हैं क्योंकि वे विशेष राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हैं और वही पृष्ठभूमि प्रॉक्टोरियल टीम के भीतर भी मौजूद है। इन तत्वों पर कार्रवाई करने की जगह उन्हें संरक्षण दिया जाता है और कई बार छात्र संगठनों के खिलाफ माहौल बनाने के लिए इन्हें उपयोग भी किया जाता है।

यह पैटर्न नया नहीं है। रविकांत सर की घटना के दौरान, रोहित वेमुला की याद में हुए विरोध के दौरान और हाल ही में मदरी काकोटी और नेहा सिंह राठौर के पक्ष में हुए प्रदर्शन के दौरान भी यही रवैया देखने को मिला। सतह पर प्रॉक्टोरियल टीम खुद को निष्पक्ष बताती है, लेकिन घटनाओं की श्रृंखला यह सिद्ध करती है कि निष्पक्षता केवल दिखावा है और उसके पीछे राजनीतिक संरक्षण, दंड से प्रतिरक्षा और मिलीभगत मौजूद है। घृणा फैलाने वाली विचारधारा से जुड़े लोग जिस आसानी से कैंपस में सक्रिय रहते हैं, वह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि प्रॉक्टोरियल तंत्र पूरी तरह विफल हो चुका है और इस राजनीतिक आक्रमण के सामने लाचार है।

एक और गलत तर्क यह लगाया जा रहा है कि संयुक्त छात्र मोर्चा एक व्यक्ति की हरकत के आधार पर पूरे समुदाय को निशाना बना रहा है। यह तर्क न केवल तथ्यहीन है बल्कि बौद्धिक रूप से भी कमजोर है। ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद के बीच का अंतर समझना आवश्यक है। ब्राह्मणवाद एक व्यक्ति या समुदाय नहीं बल्कि एक सामाजिक व्यवस्था है। भारत में अनेक ब्राह्मण ब्राह्मणवाद के खिलाफ खड़े होते हैं और अनेक गैर ब्राह्मण ब्राह्मणवाद का बचाव करते हैं। ठीक उसी तरह जैसे पितृसत्ता की आलोचना करना सभी पुरुषों या सभी पिताओं की आलोचना करना नहीं होता। हमारा राहुल पांडे के निलंबन की मांग करना किसी समुदाय पर हमला नहीं है। इसे जाति मुद्दे में बदलना स्वयं यह सिद्ध करता है कि सामाजिक पूंजी किस तरह गलत लोगों को भी संरक्षण देती है। हमें कई तरह की धमकियाँ मिल रही हैं, लेकिन यह नया नहीं है। स्वयं बाबासाहेब अंबेडकर और उनके साथियों पर भी केवल पानी पीने के अधिकार की मांग करने पर हमले हुए थे। जब कोई समाज असमानता की संरचनाओं पर सवाल उठाता है, तो उसे विरोध का सामना करना ही पड़ता है।

संयुक्त छात्र मोर्चा विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने एक मूल राजनीतिक प्रश्न रखता है। क्या लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्रों की सुरक्षा और गरिमा की रक्षा करने का दायित्व निभाया जा रहा है। हमारी प्रस्तुतियों से यह स्पष्ट है कि प्रॉक्टोरियल बोर्ड इस दायित्व में असफल है। और जब हम यह बात बताते हैं तो हमें धमकाया जाता है कि उनके पास भी हमारे खिलाफ बहुत घटनाएँ दर्ज हैं। ऐसा वातावरण किसी भी प्रकार के शैक्षणिक या बौद्धिक विकास की अनुमति नहीं देता। इसलिए विश्वविद्यालय प्रशासन को प्रॉक्टोरियल व्यवस्था का पुनर्गठन करना होगा और छात्र प्रतिनिधियों को इस संरचना में शामिल करना होगा क्योंकि छात्र संघ की अनुपस्थिति में यह एकमात्र लोकतांत्रिक उपाय है।

संयुक्त छात्र मोर्चा इन मांगों के साथ आगे बढ़ेगा क्योंकि छात्रों की सुरक्षा, सम्मान और लोकतांत्रिक अधिकारों को किसी भी परिस्थिति में कम नहीं किया जा सकता।

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