Homeराज्यउत्तर प्रदेशविश्वास के साथ-साथ विवेक का होना आवश्यक

विश्वास के साथ-साथ विवेक का होना आवश्यक

राजधानी के राजाजीपुरम में रामकथा का दूसरा दिन

लाइव सत्यकाम न्यूज, लखनऊ : राजाजीपुरम (जलालपुर क्रोसिंग,पारा रोड) में चल रही सात दिवसीय श्री रामकथा के द्वितीय दिवस
राघवचरणानुरागी हरिओम तिवारी ने आज कथा में कहा की विवेक का साथ जब विश्वास छोड़ देता है तब अंधविश्वास का रूप धारण कर लेता है। यह सच है कि बिना विश्वास के कोई भी वैज्ञानिक बड़ी शोध नहीं कर सकता है परंतु के विश्वास के साथ-साथ विवेक का होना भी आवश्यक है। यदि हमारा कोई सम्मान करता है तो सम्मानकर्ता के प्रति हमें विनम्र होना चाहिए।

हमारे अंदर इस भाव का उदय नहीं होना चाहिए की सम्मान हमारी योग्यता के कारण हो रहा है यदि योग्यता समझ लेंगे तो हमारे अंदर अहंकार की प्रवृत्ति आ जाएगी जैसे कि सती जी के अंदर आ गई थी ।यद्यपि अगस्त जी ने शिवजी का पूजन किया यह मानकर कृपा करके शिवजी हमारे पास आए हैं और शिवजी भी उसी भाव में आए कि वक्ता इतना विनम्र है कि श्रोता का पूजन कर रहा है। यह विश्वास का प्रमाण था ।

तर्क का प्रमाण यह था कि सती जी को लगा कि जो वक्ता श्रोता का पूजन कर रहा है वह किस प्रकार की कथा श्रवण कराएगा ।इसलिए कथा के प्रति और वक्ता के प्रति विश्वास का भाव रखना चाहिए। यह रामचरितमानस की कथा यदि बुधजन को विश्राम देती है तो साधारण मानव के मन का भी रंजन कर देती है।

इसलिए
श्री रामकथा गिरा ग्राम्य में लिखी गई है । जिस प्रकार मां गंगा जी ब्रह्म लोक में रहती तो शायद सबको पवन ना कर पाती परंतु उन्होंने ब्रह्मलोक से मृत्यु लोक में आकर सबको पवन किया।

इस प्रकार यह रामकथा शिव जी के मानस में यदि रखी रहती तो जनमानस का को सुलभ न होती शिवजी के मानस से निकलकर गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के रूप में जनमानस को सुलभ कराया । राम ईश्वर हैं और हमें ईश्वर की लीला में संशय नहीं रखना चाहिए ।यदि हम ईश्वर की लीला में संशय करेंगे तो ना हमारा शरीर रहेगा और ना जीवन रहेगा और हम अपनी ही संशय की अग्नि में जलकर भस्म हो जाएंगे।

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