बंबई उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) को रेस्तरां, होटलों और सरकारी कैंटीनों के खिलाफ कथित पक्षपातपूर्ण कार्रवाई को लेकर कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून सभी के लिए समान है और किसी भी सरकारी या निजी संस्थान के साथ अलग-अलग मानदंड नहीं अपनाए जा सकते। इसी के साथ अदालत ने मंत्रालय (मंत्रालय भवन) की कैंटीनों को सुधारात्मक नोटिस जारी करने और वहां की स्वच्छता व्यवस्था की दोबारा जांच कराने का निर्देश दिया। अदालत की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब वकीलों की एक समिति ने मंत्रालय की कैंटीन का निरीक्षण कर वहां गंदगी, खुली नालियां, टूटे हुए सीवेज और रसोई में कॉकरोच व मक्खियां मिलने की जानकारी दी।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखड की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि महाराष्ट्र FDA को अपनी कार्रवाई में पूरी तरह निष्पक्ष, भेदभाव रहित और समान रवैया अपनाना चाहिए। अदालत ने कहा कि यदि निजी रेस्तरां और होटलों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाती है तो सरकारी संस्थानों की कैंटीनों के मामले में भी वही मानक लागू होने चाहिए। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस देश में कोई भी कानून से ऊपर नहीं है और सभी के साथ समान व्यवहार होना चाहिए।
दरअसल, सुनवाई के दौरान अदालत के सामने महाराष्ट्र FDA की ओर से एक रिपोर्ट पेश की गई थी, जिसमें मंत्रालय की कैंटीन को स्वच्छता के मामले में 98 प्रतिशत अंक दिए गए थे। इस रिपोर्ट पर अदालत ने संदेह जताया और तुरंत चार वकीलों की एक समिति बनाकर मंत्रालय की कैंटीन का निरीक्षण करने का आदेश दिया। समिति ने कुछ ही घंटों में अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंप दी, जिसमें कैंटीन की वास्तविक स्थिति को बेहद खराब बताया गया। रिपोर्ट के अनुसार, कैंटीन परिसर में गंदगी फैली हुई थी, सीवेज लाइन क्षतिग्रस्त थी, नालियां खुली थीं और रसोई की दीवारों व फर्श पर कॉकरोच तथा मक्खियां मौजूद थीं।
समिति द्वारा प्रस्तुत तस्वीरों और निरीक्षण रिपोर्ट को देखने के बाद अदालत ने गहरी नाराजगी जाहिर की। न्यायालय ने सवाल उठाया कि जिस कैंटीन में इतनी गंभीर खामियां मिलीं, उसे FDA ने 98 प्रतिशत स्वच्छता प्रमाणपत्र कैसे दे दिया। अदालत ने कहा कि यदि इसी तरह की कमियों के कारण दक्षिण मुंबई के पूर्णिमा रेस्तरां को निलंबन नोटिस जारी किया गया था, तो मंत्रालय की कैंटीन के खिलाफ भी समान कार्रवाई होनी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी संस्थानों को किसी प्रकार की विशेष छूट नहीं दी जा सकती।
पूर्णिमा रेस्तरां की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता वेंकटेश धोंड ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल को कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना सीधे निलंबन नोटिस जारी कर दिया गया था। इस पर अदालत ने FDA से पूछा कि आखिर एक ही प्रकार की कमियों के बावजूद निजी रेस्तरां और सरकारी कैंटीन के साथ अलग-अलग व्यवहार क्यों किया गया। अदालत ने कहा कि या तो मंत्रालय की कैंटीन का लाइसेंस भी निलंबित किया जाए या फिर पूर्णिमा रेस्तरां के खिलाफ की गई कार्रवाई पर पुनर्विचार किया जाए।
सुनवाई के दौरान FDA की ओर से अदालत को बताया गया कि पूर्णिमा रेस्तरां को जारी किया गया निलंबन नोटिस अब सुधारात्मक कारण बताओ नोटिस में बदला जाएगा और दोबारा निरीक्षण किया जाएगा। अदालत ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि मंत्रालय की तीनों कैंटीनों को भी इसी प्रकार के सुधारात्मक नोटिस जारी किए जाएं। साथ ही इन कैंटीनों को निर्धारित समय सीमा के भीतर आवश्यक सुधार करने का अवसर दिया जाए और उसके बाद दोबारा निरीक्षण किया जाए।
उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र FDA के आयुक्त तुकाराम मुंडे को भी निर्देश दिया कि वे उन अधिकारियों की रिपोर्ट की समीक्षा करें जिन्होंने मंत्रालय की कैंटीन को 98 प्रतिशत स्वच्छ घोषित किया था। अदालत ने कहा कि यदि जांच में यह साबित होता है कि अधिकारियों ने गलत या भ्रामक रिपोर्ट पेश की है, तो उनके खिलाफ उचित विभागीय कार्रवाई की जाए। अदालत ने यह भी कहा कि FDA द्वारा खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता को लेकर किए जा रहे प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन एजेंसी को अपनी कार्रवाई में पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष रहना होगा।
सुनवाई के दौरान अदालत ने FDA से यह भी पूछा कि किन मानकों के आधार पर कुछ संस्थानों को केवल सुधारात्मक नोटिस दिए जाते हैं, जबकि अन्य को सीधे निलंबन नोटिस जारी कर दिया जाता है। अदालत ने निरीक्षण के दौरान ली गई तस्वीरें और वीडियो भी पेश करने को कहा और स्पष्ट किया कि सरकारी और निजी संस्थानों के लिए अलग-अलग नियम स्वीकार नहीं किए जा सकते। न्यायालय ने दोहराया कि खाद्य सुरक्षा के मामलों में समानता और निष्पक्षता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
मामले की अगली सुनवाई 6 अगस्त को निर्धारित की गई है। तब तक मंत्रालय की कैंटीनों में सुधारात्मक कार्रवाई, दोबारा निरीक्षण और FDA द्वारा उठाए गए कदमों की रिपोर्ट अदालत के सामने प्रस्तुत की जाएगी। इस मामले को सरकारी संस्थानों में स्वच्छता व्यवस्था और नियामक एजेंसियों की निष्पक्ष कार्यप्रणाली के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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