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आरडीएसएस स्कीम में अरबों रुपए खर्च के बाद निजीकरण का कोई औचित्य नहीं : शैलेन्द्र दुबे

लाइव सत्यकाम न्यूज,लखनऊ :विधुत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के सयोजक शैलेन्द्र दुबे ने कहा कि पूर्वांचल विधुत वितरण निगम और दक्षिणांचलविधुत वितरण निगम में आरडीएसएस स्कीम और बिजनेस प्लान के तहत अरबो रुपए की योजनाएं स्वीकृत करने के बाद इन निगमों को निजी घरानों को मात्र 6500 करोड रुपए की रिजर्व प्राइस पर सौंपने का क्या औचित्य है । संघर्ष समिति ने आरोप लगाया कि जितनी धनराशि सुधार के लिए खर्च की जा रही है उससे कहीं कम धनराशि की रिजर्व प्राइस पर इन विधुत वितरण निगमों को बेचा जा रहा है।
संघर्ष समिति ने कहा कि पावर कार्पोरेशन प्रबंधन निजी घरानों के साथ मिली भगत में उत्तर प्रदेश सरकार सरकार और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को अंधेरे में रखकर एक लाख करोड रुपए की परिसंपत्तियों को कौड़ियों के मोल बेचना चाहते हैं।
विधुत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के केंद्रीय पदाधिकारियों ने बताया कि हाल ही में उप्र पॉवर कॉरपोरेशन ने बिजनेस प्लान के तहत पूर्वांचल विधुत वितरण निगम के लिए 824.65 करोड रुपए और दक्षिणांचल विधुत वितरण निगम के लिए 819 करोड रुपए का बिजनेस प्लान स्वीकृत किया है। बिजनेस प्लान के तहत इन दोनों विद्युत वितरण निगमों में बिजली व्यवस्था में सुधार हेतु कार्य किया जाना है। संघर्ष समिति ने कहा की इन दोनों विधुत वितरण निगमों में बिजनेस प्लान के तहत 16.43 अरब रुपए खर्च करने के बाद इन निगमों को निजी घरानों को कौड़ियों के मोल बेचना कदापि स्वीकार्य नहीं है।
संघर्ष समिति ने कहा कि भारत सरकार की आरडीएसएस योजना के अंतर्गत विधुत वितरण निगमों में नए बिजली उपकेंद्रों को बनाने और बने हुए बिजली उपकेंद्रों को सुधार करने और उनका नवीनीकरण करने का कार्य किया जा रहा है। इस हेतु भी पूर्वांचल विधुत वितरण निगम और दक्षिणांचल विधुत वितरण निगम के लिए भारत सरकार ने 7089 करोड़ रुपए स्वीकृत किए हैं।
आरडीएसएस योजना के अंतर्गत पूर्वांचल विधुत वितरण निगम के लिए 3842 करोड रुपए और दक्षिणांचल विधुत वितरण निगम के लिए 3247 करोड रुपए खर्च किए जा रहे हैं।
संघर्ष समिति ने कहा कि आरडीएसएस योजना और बिजनेस प्लान में पूर्वांचल विधुत वितरण निगम और दक्षिणांचल विधुत वितरण निगम के लिए कुल 8732 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे है।
संघर्ष समिति ने बताया कि पावर कॉरपोरेशन द्वारा निजीकरण हेतु तैयार किए गए आरएफपी डॉक्यूमेंट के तहत इन विधुत वितरण निगमों को बेचने की रिजर्व प्राइस मात्र 6500 करोड़ पर रखी गई है जबकि इनकी परिसंपत्तियों लगभग एक लाख करोड रुपए की हैं।
संघर्ष समिति ने इस बात पर आश्चर्य प्रकट किया कि बेचने के लिए जो रिजर्व प्राइस रखी गई है उससे अधिक की धनराशि इन विधुत वितरण निगमों के सुधार में खर्च की जा रही है। यह कौन सा रिफॉर्म है जिसमें सरकारी धन से सुधार कर इसे निजी घरानों को कौड़ियों के मोल बेचा जा रहा है ?

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