Sunday, April 19, 2026
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कचरा प्रबंधन: नगर निगम क्यों असफल?

भारत में कचरा प्रबंधन आज एक गंभीर शहरी संकट बन चुका है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, बढ़ती आबादी और उपभोक्तावादी जीवनशैली ने ठोस कचरे की मात्रा को कई गुना बढ़ा दिया है, लेकिन कचरा प्रबंधन की व्यवस्था अब भी उसी पुरानी सोच और कमजोर ढांचे पर टिकी हुई है। शहरों की सड़कों पर फैला कूड़ा, ओवरफ्लो होती डस्टबिन, बदहाल डंपिंग ग्राउंड और जाम नालियां यह बताने के लिए काफी हैं कि कचरा प्रबंधन के मोर्चे पर नगर निगम अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाए हैं। यही कारण है कि आज “कचरा प्रबंधन” केवल सफाई का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण और शहरी प्रशासन की बड़ी चुनौती बन चुका है।

कचरा प्रबंधन की विफलता का सबसे बड़ा कारण यह है कि अधिकांश नगर निगम आज भी इसे केवल कूड़ा उठाने तक सीमित समझते हैं। जबकि वास्तविक कचरा प्रबंधन में कचरा संग्रहण, स्रोत पर पृथक्करण, रीसाइक्लिंग, कम्पोस्टिंग और वैज्ञानिक निस्तारण जैसी पूरी प्रक्रिया शामिल होती है। कई शहरों में घरों से निकलने वाला गीला और सूखा कचरा अलग-अलग करने की व्यवस्था आज भी प्रभावी नहीं है। नतीजा यह होता है कि रीसाइक्लिंग की संभावनाएं खत्म हो जाती हैं और अधिकांश कचरा सीधे डंपिंग ग्राउंड में पहुंच जाता है।

नगर निगमों की असफलता के पीछे संसाधनों की कमी भी एक बड़ा कारण है। कई नगर निकायों के पास पर्याप्त बजट, आधुनिक कचरा वाहन, प्रशिक्षित सफाई कर्मी और तकनीकी ढांचा नहीं है। ठोस कचरा प्रबंधन की योजनाएं अक्सर कागजों में बनती हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन जमीनी स्तर पर नहीं दिखता। कई जगहों पर भ्रष्टाचार, ठेकेदारी मॉडल की कमजोर निगरानी और जवाबदेही की कमी भी कचरा प्रबंधन व्यवस्था को प्रभावित करती है। यही वजह है कि कचरा प्रबंधन की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है।

कचरा प्रबंधन में सबसे बड़ी विफलता वैज्ञानिक निस्तारण की कमी को लेकर भी है। अधिकांश शहर अब भी लैंडफिल आधारित मॉडल पर निर्भर हैं। कचरे को संसाधन में बदलने के बजाय उसे शहर से बाहर फेंक देना ही समाधान मान लिया गया है। इससे डंपिंग ग्राउंड कचरे के पहाड़ बनते जा रहे हैं, जो वायु, जल और मिट्टी प्रदूषण का बड़ा स्रोत बन चुके हैं। कई शहरों में लैंडफिल साइटों पर आग लगने की घटनाएं भी सामने आती रही हैं, जो कचरा प्रबंधन की गंभीर खामियों को उजागर करती हैं।

कचरा प्रबंधन की विफलता केवल गंदगी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह सीधे सार्वजनिक स्वास्थ्य पर असर डालती है। खुले में पड़ा कचरा मच्छरों, मक्खियों और संक्रमण फैलाने वाले जीवाणुओं को बढ़ावा देता है। इससे डेंगू, मलेरिया, टायफाइड और अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। नालियों में जमा कचरा जलभराव और शहरी बाढ़ की स्थिति पैदा करता है। इस तरह कचरा प्रबंधन की कमजोरी कई स्तरों पर शहरों को प्रभावित करती है।

हालांकि केवल नगर निगमों को दोषी ठहराना भी पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। कचरा प्रबंधन में नागरिकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जब लोग सार्वजनिक स्थानों पर कूड़ा फेंकते हैं, प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग करते हैं और घरों में गीला-सूखा कचरा अलग नहीं करते, तब कचरा प्रबंधन की चुनौती और जटिल हो जाती है। इसलिए कचरा प्रबंधन केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है।

यदि कचरा प्रबंधन को बेहतर बनाना है, तो सबसे पहले स्रोत पर कचरा पृथक्करण अनिवार्य करना होगा। हर घर, बाजार और संस्थान में गीले और सूखे कचरे को अलग करने की व्यवस्था लागू करनी होगी। इसके साथ ही कम्पोस्टिंग, रीसाइक्लिंग और वेस्ट-टू-एनर्जी जैसे मॉडल को बढ़ावा देना होगा। आधुनिक तकनीक आधारित कचरा प्रबंधन, स्मार्ट मॉनिटरिंग और जवाबदेही तय करना भी बेहद जरूरी है। नगर निगमों को केवल सफाई एजेंसी नहीं, बल्कि शहरी संसाधन प्रबंधन संस्था के रूप में विकसित करना होगा।

स्वच्छ भारत जैसे अभियानों ने कचरा प्रबंधन को राष्ट्रीय चर्चा का विषय जरूर बनाया, लेकिन स्थायी समाधान अभी भी अधूरा है। जब तक नगर निगमों की कार्यशैली में सुधार, संसाधनों में निवेश, तकनीकी आधुनिकीकरण और नागरिक सहभागिता एक साथ नहीं होगी, तब तक कचरा प्रबंधन की समस्या बनी रहेगी।

निष्कर्षतः कचरा प्रबंधन में नगर निगमों की असफलता केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं, बल्कि शहरी शासन की व्यापक विफलता का संकेत है। यदि समय रहते ठोस कचरा प्रबंधन को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गंभीर रूप ले सकता है। स्वच्छ शहर केवल नारों से नहीं, बल्कि प्रभावी कचरा प्रबंधन, जवाबदेही और जनभागीदारी से बनते हैं। अब समय आ गया है कि कचरा प्रबंधन को केवल सफाई नहीं, बल्कि विकास और स्वास्थ्य की प्राथमिकता माना जाए।

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