भारत और ब्रिटेन के बीच एक ऐसा समझौता हुआ है जिसकी चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है। यह समझौता उन खनिजों को लेकर है जो आने वाले समय की तकनीक, रक्षा और स्वच्छ ऊर्जा की रीढ़ माने जाते हैं। माना जा रहा है कि इस कदम से चीन की वैश्विक पकड़ को चुनौती मिल सकती है।
ब्रिटेन की विदेश सचिव यवेट कूपर के भारत दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच कई महत्वपूर्ण समझौते हुए। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर हुए समझौते की हो रही है।
4 जून 2026 को नई दिल्ली में भारत-यूके क्रिटिकल मिनरल्स ग्लोबल सप्लाई चेन ऑब्जर्वेटरी यानी GSCO का औपचारिक शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी और ब्रिटेन की विदेश सचिव यवेट कूपर मौजूद रहीं।
आखिर क्या होते हैं क्रिटिकल मिनरल्स?
क्रिटिकल मिनरल्स वे महत्वपूर्ण खनिज हैं जिनका उपयोग स्मार्टफोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर पैनल, बैटरी, सेमीकंडक्टर और रक्षा उपकरणों में किया जाता है। लिथियम, कोबाल्ट, ग्रेफाइट और निकेल जैसे खनिज इस श्रेणी में आते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की तकनीक और हरित ऊर्जा क्रांति इन्हीं खनिजों पर निर्भर करेगी। इलेक्ट्रिक वाहनों से लेकर आधुनिक मिसाइल प्रणालियों तक इनकी मांग लगातार बढ़ रही है।
भारत और ब्रिटेन द्वारा स्थापित इस नई ऑब्जर्वेटरी का उद्देश्य इन महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक सप्लाई चेन की निगरानी करना, संभावित जोखिमों की पहचान करना और आपूर्ति को सुरक्षित बनाना है।
दरअसल, वर्तमान समय में क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग और सप्लाई चेन पर चीन का बड़ा प्रभाव माना जाता है। ऐसे में भारत और ब्रिटेन का यह सहयोग वैश्विक स्तर पर सप्लाई स्रोतों को विविध बनाने और किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
यवेट कूपर के इस दौरे का मुख्य उद्देश्य भारत-यूके विजन 2035 की पहली वार्षिक समीक्षा करना भी था। इस दौरान विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।
दोनों देशों ने विकास, तकनीक, नवाचार, रक्षा एवं सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, स्वच्छ ऊर्जा और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत बनाने पर सहमति जताई।
विशेषज्ञों का मानना है कि क्रिटिकल मिनरल्स पर यह साझेदारी केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। इससे भारत को भविष्य की तकनीकों और ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में मजबूती मिलेगी, जबकि ब्रिटेन को एक विश्वसनीय साझेदार के साथ दीर्घकालिक सहयोग का अवसर मिलेगा।
फिलहाल, भारत और ब्रिटेन की यह नई पहल वैश्विक सप्लाई चेन को अधिक सुरक्षित और संतुलित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
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