भारत एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अस्थायी सदस्यता के लिए अपनी दावेदारी को मजबूत करने में जुटा है। वर्ष 2028-29 के कार्यकाल के लिए होने वाले चुनाव से पहले भारत ने व्यापक कूटनीतिक अभियान तेज कर दिया है। इसी क्रम में विदेश मंत्री S. Jaishankar का न्यूयॉर्क दौरा बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। माना जा रहा है कि इस दौरे के दौरान भारत विभिन्न देशों से समर्थन जुटाने की कोशिश करेगा, ताकि संयुक्त राष्ट्र महासभा में होने वाले चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत की जा सके।
इस बार मुकाबला आसान नहीं माना जा रहा है। एशिया-प्रशांत समूह की एक सीट के लिए भारत के साथ Tajikistan भी दावेदार है। ताजिकिस्तान को Organisation of Islamic Cooperation के सदस्य देशों का समर्थन मिलने की जानकारी सामने आई है। ओआईसी ने पहले ही ताजिकिस्तान की उम्मीदवारी का समर्थन करने का निर्णय दर्ज किया है। �
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भारत ऐसे समय में अपनी दावेदारी मजबूत कर रहा है जब दुनिया कई बड़े भू-राजनीतिक संकटों का सामना कर रही है। रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और ऊर्जा व खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दों ने विकासशील देशों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। भारत लगातार ग्लोबल साउथ की आवाज़ उठाता रहा है और संयुक्त राष्ट्र में सुधार की आवश्यकता पर भी जोर देता रहा है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर हाल के महीनों में कई देशों के दौरे कर चुके हैं। खाड़ी देशों, कैरेबियाई देशों और अन्य साझेदार देशों के साथ भारत ने अपने संबंधों को और मजबूत करने की कोशिश की है। माना जा रहा है कि इन दौरों का उद्देश्य केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना ही नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र में भारत की उम्मीदवारी के लिए व्यापक समर्थन जुटाना भी है।
कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के चुनाव में केवल बड़े देशों का समर्थन पर्याप्त नहीं होता। महासभा में सभी सदस्य देशों के वोट समान महत्व रखते हैं। ऐसे में छोटे द्वीपीय देशों, अफ्रीकी देशों और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों का समर्थन भी निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग करता रहा है। भारत का कहना है कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ को अधिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। भारत का तर्क है कि दुनिया की बदलती परिस्थितियों के अनुसार संयुक्त राष्ट्र की संरचना में भी बदलाव आवश्यक है ताकि संस्था अधिक प्रभावी और प्रतिनिधिक बन सके।
दूसरी ओर, ताजिकिस्तान की उम्मीदवारी को ओआईसी का समर्थन मिलने से मुकाबला और दिलचस्प हो गया है। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र में मतदान गुप्त होता है और अंतिम समय तक कई देशों का रुख बदल भी सकता है। इसलिए चुनाव से पहले कूटनीतिक गतिविधियां और तेज होने की संभावना है। �
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भारत की विदेश नीति पिछले कुछ वर्षों में बहुपक्षीय सहयोग, रणनीतिक साझेदारी और वैश्विक मंचों पर सक्रिय भागीदारी पर केंद्रित रही है। यही कारण है कि भारत अलग-अलग क्षेत्रों के देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करने पर लगातार जोर दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने में सफल रहता है तो उसकी दावेदारी और मजबूत हो सकती है।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि 2028-29 की अस्थायी सदस्यता के लिए होने वाला चुनाव केवल एक सीट का चुनाव नहीं, बल्कि वैश्विक कूटनीति की बड़ी परीक्षा भी होगा। भारत और ताजिकिस्तान दोनों ही समर्थन जुटाने में लगे हैं और आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक गतिविधियां और तेज होने की संभावना है।
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