बंबई उच्च न्यायालय ने सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के दो पदाधिकारियों के खिलाफ मुंबई पुलिस द्वारा जारी जिला बदर (Externment) के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि किसी ऐतिहासिक घटना पर राय व्यक्त करना अपने आप में राष्ट्र-विरोधी नहीं माना जा सकता। साथ ही न्यायालय ने पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल उठाए।
न्यायमूर्ति माधव जामदार की एकल पीठ ने फिरोज अब्दुल वहाब खान और मोहम्मद रफीक गुलाम रसूल अंसारी की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। दोनों नेताओं को दिसंबर 2025 में मुंबई पुलिस ने एक वर्ष के लिए मुंबई जिले से बाहर रहने का आदेश दिया था। इस आदेश को दोनों ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।
मुंबई पुलिस की कार्रवाई तीन अलग-अलग प्राथमिकी (FIR) के आधार पर की गई थी। ये मामले वक्फ विधेयक के विरोध, सीमेंट गोदामों से होने वाले वायु प्रदूषण के खिलाफ प्रदर्शन और बाबरी मस्जिद से जुड़े विरोध-प्रदर्शन में कथित भागीदारी से संबंधित थे। पुलिस का कहना था कि इन गतिविधियों से कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने बाबरी मस्जिद से जुड़े विरोध-प्रदर्शन को आधार बनाए जाने पर टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति यह राय रखता है कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस नहीं होना चाहिए था, तो केवल इस आधार पर उसे राष्ट्र-विरोधी नहीं कहा जा सकता। अदालत के अनुसार, किसी मुद्दे पर अपनी राय रखना नागरिकों के अधिकारों के दायरे में आता है।
अदालत ने यह भी कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से ऐसा प्रतीत होता है कि संबंधित प्रदर्शनों में अन्य राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता भी शामिल थे, लेकिन कार्रवाई केवल याचिकाकर्ताओं के खिलाफ की गई। न्यायालय ने इस पहलू पर भी सवाल उठाए और कहा कि पुलिस की कार्रवाई चुनिंदा नजर आती है।
फैसले में अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि संबंधित एफआईआर में केवल नारेबाजी का जिक्र है। रिकॉर्ड में ऐसा कोई संकेत नहीं मिला कि प्रदर्शन के दौरान किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाया गया हो या सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंची हो। अदालत ने कहा कि केवल काल्पनिक आशंकाओं के आधार पर किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से मुख्य सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि दोनों याचिकाकर्ताओं के प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से कथित संबंध रहे हैं और इससे सामाजिक सौहार्द प्रभावित हो सकता है। हालांकि, अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
उच्च न्यायालय ने कहा कि पीएफआई से कथित संबंध का उल्लेख उन कारण बताओ नोटिसों में नहीं था, जो जिला बदर की कार्रवाई से पहले याचिकाकर्ताओं को जारी किए गए थे। इसलिए बाद में इस आधार पर कार्रवाई को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
अदालत ने अंततः दोनों नेताओं के खिलाफ जारी जिला बदर के आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि प्रशासनिक कार्रवाई कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप ही होनी चाहिए। यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रशासनिक कार्रवाई और नागरिक अधिकारों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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