असम के लोक संगीत की मिट्टी से निकलकर अंतरिक्ष की अनंत दुनिया तक संगीत का सफर तय करने वाले गायक, गीतकार और संगीतकार जॉय बरुआ इन दिनों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में हैं। उनकी संगीत यात्रा असम की लोक परंपराओं, भारतीय संगीत की विविधता और पश्चिमी संगीत के प्रभावों से गुजरते हुए अब ब्रह्मांड की ध्वनियों और तारों की कहानियों तक पहुंच गई है।
जॉय बरुआ का संगीत से रिश्ता बेहद कम उम्र में शुरू हुआ। महज चार वर्ष की उम्र में उनके पिता ने उन्हें वायलिन दिया था। यही वाद्य उनके संगीत सफर की शुरुआती कड़ी बना। आगे चलकर असम की लोक संगीत परंपरा ने उनके संगीत को गहराई से प्रभावित किया। असम की सांस्कृतिक विरासत और लोक धुनों की मिठास उनके संगीत में लंबे समय तक दिखाई देती रही।
उनकी संगीत यात्रा पर महान असमिया कलाकार भूपेन हजारिका का भी प्रभाव रहा। भूपेन हजारिका ने असमिया संगीत को देश और दुनिया के सामने एक अलग पहचान दिलाई थी। जॉय बरुआ ने अपनी संगीत समझ को विकसित करते हुए भारतीय लोक परंपराओं के साथ अंतरराष्ट्रीय संगीत को भी करीब से अपनाया।
उनके संगीत पर बीटल्स, स्टिंग और यू2 जैसे अंतरराष्ट्रीय कलाकारों और बैंड का भी प्रभाव पड़ा। इन अलग-अलग संगीत परंपराओं और प्रभावों के मेल ने जॉय बरुआ की अपनी एक विशिष्ट संगीत शैली को आकार दिया। उनकी रचनाओं में स्थानीय संस्कृति और वैश्विक संगीत का मिश्रण देखने को मिलता है।
अब उनकी यह संगीत यात्रा एक बिल्कुल अलग और विशाल विषय से जुड़ गई है। ‘कॉस्मिक रैप्सोडी’ नामक अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन कला परियोजना में जॉय बरुआ प्रमुख भारतीय संगीतकारों में शामिल हैं। इस परियोजना की विषयवस्तु ब्रह्मांड, मरते हुए तारों, तारों की धूल और नई दुनिया के निर्माण जैसी अवधारणाओं के इर्द-गिर्द घूमती है।
‘कॉस्मिक रैप्सोडी’ में विज्ञान और संगीत को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया गया है। ब्रह्मांड में मौजूद विशाल घटनाओं और तारों से जुड़ी अवधारणाओं को संगीत तथा प्रदर्शन कला के माध्यम से प्रस्तुत करने की कोशिश इस परियोजना को अलग स्वरूप देती है। जॉय बरुआ की भूमिका इस प्रयोग में भारतीय संगीत की ध्वनि और संवेदनाओं को जोड़ने की है।
दिलचस्प बात यह है कि अंतरिक्ष से जुड़ी ध्वनियों और ब्रह्मांड की कल्पना जॉय बरुआ के लिए बिल्कुल नई नहीं है। वह इससे पहले भी अपने संगीत में प्रकृति, अंतरिक्ष और ब्रह्मांड जैसे व्यापक विषयों से प्रेरणा लेते रहे हैं। यही कारण है कि ‘कॉस्मिक रैप्सोडी’ जैसी परियोजना उनके लंबे संगीत सफर की एक स्वाभाविक अगली कड़ी के रूप में भी देखी जा सकती है।
असम के लोक संगीत से शुरू हुआ यह सफर अब ऐसी कला परियोजना तक पहुंच चुका है, जहां संगीत की सीमाएं धरती से आगे ब्रह्मांड की कल्पना तक फैल रही हैं। जॉय बरुआ की कहानी यह भी दिखाती है कि स्थानीय लोक परंपराओं से निकली कला किस तरह अलग-अलग संस्कृतियों और विषयों से जुड़कर वैश्विक मंच तक पहुंच सकती है।
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