ईरान और रूस के बीच बढ़ती नजदीकियों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के मॉस्को दौरे के बाद दोनों देशों के रणनीतिक संबंध और मजबूत होने के संकेत मिल रहे हैं। रूस की ओर से ईरान में आठ परमाणु संयंत्रों के निर्माण में मदद के लिए वैज्ञानिकों की भर्ती किए जाने की खबरों ने इस घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बना दिया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या रूस ईरान की परमाणु ऊर्जा संबंधी महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाने जा रहा है?
मॉस्को पहुंचने पर ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान का भव्य स्वागत किया गया। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ उनकी मुलाकात को दोनों देशों के रिश्तों के लिहाज से अहम माना जा रहा है। रूस और ईरान लंबे समय से कई रणनीतिक मुद्दों पर एक-दूसरे के करीब रहे हैं। हालांकि, इस यात्रा के पीछे केवल द्विपक्षीय सहयोग ही नहीं, बल्कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पुतिन, तेहरान और वाशिंगटन के बीच बातचीत का रास्ता खोल सकते हैं? अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए अलग-अलग माध्यमों से प्रयास किए जाने की चर्चाओं के बीच रूस की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन क्या पुतिन दोनों देशों के बीच किसी समझौते की जमीन तैयार कर पाएंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
दूसरी ओर, ईरान ने अपने संवर्धित यूरेनियम को किसी अन्य देश को सौंपने से इनकार करते हुए अपना रुख सख्त रखा है। ईरान का यह रुख अमेरिका के साथ उसके परमाणु विवाद को और जटिल बना सकता है। तेहरान की ओर से अमेरिकी दबाव के खिलाफ कड़ा जवाब देने की चेतावनी भी इस बात का संकेत है कि फिलहाल दोनों देशों के बीच मतभेद आसानी से खत्म होने वाले नहीं हैं।
रूस की ओर से ईरान में आठ परमाणु संयंत्रों के निर्माण में सहयोग की खबरें भी खास महत्व रखती हैं। यदि यह योजना आगे बढ़ती है, तो इससे ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में रूस की भूमिका बढ़ सकती है। हालांकि, इन संयंत्रों की वास्तविक स्थिति, निर्माण की समयसीमा और सहयोग की शर्तों को लेकर आधिकारिक जानकारी की पुष्टि जरूरी है। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का निर्माण अपने आप में परमाणु हथियार बनाने का प्रमाण नहीं होता, लेकिन ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर पहले से मौजूद अंतरराष्ट्रीय चिंताओं के कारण इस सहयोग पर दुनिया की नजर बनी रह सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम का असर अमेरिका की रणनीति पर भी पड़ सकता है। वाशिंगटन के लिए एक तरफ ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंताएं हैं, तो दूसरी तरफ रूस और ईरान के बीच मजबूत होते संबंध क्षेत्रीय समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, केवल इन घटनाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि रूस अमेरिका के खिलाफ किसी सैन्य योजना में ईरान की मदद करने जा रहा है।
अब निगाहें पुतिन और पेजेश्कियान की बातचीत के नतीजों पर टिकी हैं। क्या रूस ईरान को परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ा सहयोग देगा? क्या पुतिन अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम कराने में सफल होंगे? या फिर रूस और ईरान की बढ़ती नजदीकियां वाशिंगटन के साथ टकराव को और बढ़ाएंगी? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में दोनों देशों के आधिकारिक बयानों और ठोस फैसलों से ही स्पष्ट होंगे।
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