लखनऊ। गोमती पुस्तक महोत्सव में मंगलवार को ग्रुप कैप्टन और अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों के साथ अपने अंतरिक्ष मिशन, बचपन, शिक्षा, भारतीय वायुसेना की सेवा और अंतरिक्ष यात्री बनने के सफर से जुड़े अनुभव साझा किए। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत की ओर से आयोजित विशेष संवाद सत्र ‘धरती से अंतरिक्ष तक सपनों की उड़ान’ में शुभांशु शुक्ला ने कहा कि अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने के बाद इंसान की सोच और दुनिया को देखने का नजरिया बदल जाता है।
कार्यक्रम के दौरान शुभांशु शुक्ला की अंग्रेजी पुस्तक ‘द सेकेंड ऑर्बिट’ का लोकार्पण भी किया गया। उन्होंने अपने परिजनों के साथ संयुक्त रूप से पुस्तक का विमोचन किया। इस अवसर पर भारत के प्रथम अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा ने वीडियो संदेश के माध्यम से शुभांशु शुक्ला को शुभकामनाएं दीं और उनकी पुस्तक तथा अंतरिक्ष यात्रा की सराहना की।
अंतरिक्ष से नहीं दिखतीं देशों की सीमाएं
विद्यार्थियों से संवाद करते हुए शुभांशु शुक्ला ने कहा कि अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने का अनुभव बेहद अलग होता है। वहां से न देशों की सीमाएं दिखाई देती हैं, न शहर और न ही क्षेत्रीय विभाजन। अंतरिक्ष से पूरी पृथ्वी एक सुंदर और एकीकृत ग्रह के रूप में नजर आती है।
उन्होंने कहा कि यदि अंतरिक्ष में कोई उनसे पूछे कि वे कहां से आए हैं और वे अपने शहर या देश का नाम बताएं तो शायद वह पहचान समझना मुश्किल हो। लेकिन यदि वह कहें कि वे ‘पृथ्वी से आए हैं’, तो यह पहचान तुरंत स्पष्ट हो जाती है।
शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों को समझाया कि अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने पर एहसास होता है कि धरती पर बनाई गई सीमाएं कितनी छोटी हैं और पूरी मानवता एक ही ग्रह का हिस्सा है।
शुभांशु शुक्ला ने बताया अंतरिक्ष मिशन का पहला अनुभव
अपने अंतरिक्ष मिशन की शुरुआत को याद करते हुए शुभांशु शुक्ला ने कहा कि पहली बार अंतरिक्ष की ओर रवाना होते समय मन में उत्साह के साथ डर भी था। उन्होंने इस अनुभव की तुलना परीक्षा से की।
उन्होंने कहा कि कई बार पूरी तैयारी होने के बावजूद परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले कुछ क्षणों के लिए दिमाग खाली-सा महसूस होता है। अंतरिक्ष यात्रा के शुरुआती क्षणों में भी उन्हें कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ। हालांकि, उन्होंने खुद को संभाला और मानसिक रूप से मजबूत रहते हुए मिशन पर आगे बढ़े।
अंतरिक्ष में पानी क्यों तैरता है?
शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों को अंतरिक्ष में जीवन से जुड़े कई रोचक अनुभव बताए। उन्होंने कहा कि सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण यानी माइक्रोग्रैविटी के कारण अंतरिक्ष में रोजमर्रा की कई गतिविधियां पृथ्वी से बिल्कुल अलग हो जाती हैं।
उन्होंने बताया कि यदि अंतरिक्ष में पानी छोड़ा जाए तो वह पृथ्वी की तरह नीचे नहीं गिरता, बल्कि छोटी-छोटी गोल बूंदों के रूप में तैरता रहता है। माइक्रोग्रैविटी की यही परिस्थितियां वैज्ञानिकों को मानव शरीर और अन्य प्रक्रियाओं पर शोध करने का अवसर देती हैं।
अपने मिशन के दौरान किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि इन प्रयोगों के माध्यम से माइक्रोग्रैविटी के मानव शरीर और आसपास के वातावरण पर प्रभावों को समझने का प्रयास किया गया।
अंतरिक्ष में शरीर की मांसपेशियों पर पड़ता है असर
लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने के दौरान मानव शरीर में कई बदलाव होते हैं। शुभांशु शुक्ला ने बताया कि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के विपरीत अंतरिक्ष में शरीर को लगातार भार वहन नहीं करना पड़ता। इससे मांसपेशियों की ताकत प्रभावित हो सकती है।
इसी कारण अंतरिक्ष यात्रियों के लिए नियमित व्यायाम जरूरी होता है। अंतरिक्ष यान के अंदर हवा, तापमान और अन्य पर्यावरणीय परिस्थितियों को भी नियंत्रित रखा जाता है।
उन्होंने बताया कि पृथ्वी पर वापस लौटने के बाद भी शरीर को सामान्य गुरुत्वाकर्षण के अनुरूप ढलने में समय लगता है। शुरुआत में चलना, बैठना और लेटना भी सामान्य से अलग महसूस हो सकता है।
गगनयान मिशन और भारत का अंतरिक्ष सपना
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम पर चर्चा करते हुए शुभांशु शुक्ला ने कहा कि देश अंतरिक्ष के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रहा है। गगनयान मिशन भारत के मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
उन्होंने कहा कि भविष्य में चंद्रमा पर भारतीय मानव मिशन की दिशा में आगे बढ़ना भी देश के बड़े लक्ष्यों में शामिल है। ये उपलब्धियां केवल वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष यात्रियों की नहीं हैं, बल्कि पूरे भारत के सपनों से जुड़ी हैं।
उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि आने वाली पीढ़ी भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
लखनऊ का युवा भी बन सकता है अंतरिक्ष यात्री
लखनऊ के विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए शुभांशु शुक्ला ने कहा कि इसी शहर का कोई युवा भविष्य में अंतरिक्ष यात्री बन सकता है। इसके लिए निरंतर मेहनत, अनुशासन, समर्पण और मानसिक मजबूती आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य तभी मजबूत होगा, जब देश का युवा अपनी जिम्मेदारी समझे और अपने क्षेत्र में पूरी ईमानदारी के साथ योगदान दे।
राकेश शर्मा के ‘सारे जहां से अच्छा’ संदेश को किया याद
शुभांशु शुक्ला ने भारत के प्रथम अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा के प्रसिद्ध संदेश ‘सारे जहां से अच्छा’ का उल्लेख करते हुए कहा कि अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने का अनुभव दुनिया को देखने का नजरिया बदल देता है।
अंतरिक्ष से शहरों की रोशनी, हिमालय और पृथ्वी की प्राकृतिक सुंदरता दिखाई देती है, लेकिन देशों की सीमाएं नजर नहीं आतीं। यह अनुभव बताता है कि पूरी मानवता एक ही ग्रह से जुड़ी हुई है।
लखनऊ के पुराने दिनों को किया याद
अपने बचपन के लखनऊ को याद करते हुए शुभांशु शुक्ला ने कहा कि उनके स्कूल के समय का लखनऊ आज के शहर से काफी अलग था। उस समय सुविधाएं सीमित थीं और बिजली की कटौती भी आम थी।
उन्होंने कहा कि उस दौर में अंतरिक्ष तक पहुंचने का सपना देखना आसान नहीं था। उन्होंने भी कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वह अंतरिक्ष की यात्रा करेंगे। लेकिन लगातार मेहनत और बड़े लक्ष्य ने इस सपने को हकीकत में बदल दिया।
‘अंतरिक्ष यात्री भी आम इंसानों की तरह होते हैं’
शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों से कहा कि अंतरिक्ष यात्री कोई अलग तरह के इंसान नहीं होते और उनके पास कोई जादुई शक्ति नहीं होती। अंतर केवल सोच, लक्ष्य और उसे हासिल करने के लिए किए जाने वाले लगातार प्रयास का है।
उन्होंने कहा कि आज के युवाओं के पास शिक्षा और तकनीक के क्षेत्र में पहले की तुलना में कहीं अधिक संसाधन उपलब्ध हैं। जरूरत इन संसाधनों का सही इस्तेमाल करने और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहने की है।
2019 में मिला चयन का संदेश, बदल गया जीवन
अपने जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव को याद करते हुए शुभांशु शुक्ला ने बताया कि वर्ष 2019 उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा। उस समय वह बेंगलुरु में थे, जब उन्हें अपने चयन की सूचना मिली।
उन्होंने बताया कि संदेश मिलने के बाद वह कुछ देर तक अपनी गाड़ी के पास खड़े रहे और उस पल को महसूस करते रहे। इसके बाद उन्होंने सबसे पहले यह खबर अपनी पत्नी और बच्चों के साथ साझा की।
उन्होंने कहा कि परिवार की खुशी ने उन्हें यह एहसास कराया कि यह उपलब्धि केवल उनकी व्यक्तिगत सफलता नहीं थी, बल्कि पूरे परिवार के सहयोग और विश्वास का परिणाम थी।
परिवार को बताया अपनी सफलता की ताकत
भारतीय वायुसेना में सेवा और अंतरिक्ष यात्रा के दौरान परिवार के सहयोग को याद करते हुए शुभांशु शुक्ला ने अपनी पत्नी कामना के योगदान का विशेष उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि चुनौतीपूर्ण समय में परिवार का विश्वास उनकी ताकत बना। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि किसी भी सफलता के पीछे परिवार, शिक्षक, मित्र और सहयोगियों का योगदान महत्वपूर्ण होता है।
शुभांशु शुक्ला का युवाओं को संदेश
संवाद के अंत में शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों से कहा कि जीवन में बड़ा सपना देखने से कभी नहीं डरना चाहिए। लक्ष्य बड़ा हो, मेहनत ईमानदार हो और प्रयास लगातार जारी रहे तो मुश्किल से मुश्किल मंजिल हासिल की जा सकती है।
उन्होंने कहा कि जो सपना आज असंभव लगता है, वही भविष्य में जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बन सकता है। उन्होंने युवाओं से भारत के विकास में सक्रिय योगदान देने और देश के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में अपनी भूमिका निभाने का आह्वान किया।
गोमती पुस्तक महोत्सव में शुभांशु शुक्ला का संवाद विद्यार्थियों के लिए अंतरिक्ष विज्ञान और व्यक्तिगत प्रेरणा का अनूठा संगम रहा। उनकी कहानी ने यह संदेश दिया कि बड़े सपनों के लिए परिस्थितियां नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प, अनुशासन और निरंतर प्रयास सबसे महत्वपूर्ण होते हैं।
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