उत्तर प्रदेश में नकली FASTag और फर्जी वाहन पंजीकरण नंबर के जरिए टोल ट्रैकिंग और ऑनलाइन चालान से बचने के कथित खेल का खुलासा हुआ है। उत्तर प्रदेश पुलिस की विशेष कार्यबल यानी एसटीएफ ने इस मामले में 28 वर्षीय मनीष नाम के आरोपी को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया है कि कथित तौर पर एक ऐसा तरीका अपनाया जा रहा था, जिससे हाईवे पर चलने वाले भारी वाहनों की पहचान और उनकी आवाजाही को लेकर इलेक्ट्रॉनिक निगरानी से बचने की कोशिश की जाती थी।
बताया जा रहा है कि इस कथित नेटवर्क में नकली FASTag और फर्जी पंजीकरण नंबर का इस्तेमाल किया जाता था। सामान्य तौर पर FASTag के जरिए टोल प्लाजा पर वाहन की पहचान और टोल भुगतान की प्रक्रिया दर्ज होती है। इसके साथ ही वाहनों की आवाजाही से जुड़ी जानकारी अलग-अलग प्रणालियों में दर्ज हो सकती है। आरोप है कि इसी व्यवस्था का गलत फायदा उठाते हुए कुछ वाहनों की वास्तविक पहचान छिपाने की कोशिश की जा रही थी।
जांच एजेंसियों के अनुसार, यह मामला खास तौर पर हाईवे पर चलने वाले भारी वाहनों से जुड़ा है। इन वाहनों में कथित तौर पर ओवरलोड खनिज सामग्री ले जाने की बात सामने आई है। इसमें मोरंग जैसी सामग्री भी शामिल बताई जा रही है। यदि कोई भारी वाहन निर्धारित क्षमता से अधिक सामग्री लेकर सड़क पर चलता है, तो उस पर कार्रवाई और जुर्माने का प्रावधान होता है। ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक निगरानी और चालान व्यवस्था से बचने के लिए वाहन की पहचान छिपाने का प्रयास जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
एसटीएफ की जांच में कथित तौर पर यह भी सामने आया कि फर्जी नंबर के इस्तेमाल से ऑनलाइन यातायात चालान की प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की जाती थी। किसी वाहन के नंबर पर दर्ज जानकारी और सड़क पर वास्तव में चल रहे वाहन के बीच अंतर होने पर कार्रवाई का रिकॉर्ड गलत वाहन तक पहुंच सकता है। इसी तरह टोल से जुड़ी जानकारी में भी गड़बड़ी पैदा होने की आशंका रहती है।
इस पूरे मामले में 28 वर्षीय मनीष की गिरफ्तारी के बाद जांच और आगे बढ़ने की उम्मीद है। एसटीएफ अब यह पता लगाने की कोशिश कर सकती है कि इस कथित नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल थे, फर्जी FASTag और नंबर प्लेट की व्यवस्था कैसे की जाती थी और किन-किन वाहनों में इनका इस्तेमाल हुआ। जांच में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि इस व्यवस्था से कितने समय तक टोल और यातायात निगरानी को प्रभावित किया गया।
इस कथित रैकेट से सरकारी राजस्व को बड़े नुकसान की आशंका भी जताई जा रही है। हालांकि वास्तविक वित्तीय नुकसान कितना हुआ, इसका स्पष्ट आंकड़ा विस्तृत जांच के बाद ही सामने आ सकेगा। मामले में शामिल वाहनों, टोल रिकॉर्ड, पंजीकरण संबंधी जानकारी और ऑनलाइन चालान के आंकड़ों की जांच इस पूरे नेटवर्क की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकती है।
फिलहाल एसटीएफ की कार्रवाई के बाद मामला चर्चा में है। नकली FASTag, फर्जी नंबर और टोल व्यवस्था से बचने के कथित इस खेल ने हाईवे पर वाहनों की डिजिटल निगरानी और पहचान प्रणाली की सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। आरोपी से पूछताछ और आगे की जांच के बाद इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों और इसके जरिए हुए संभावित राजस्व नुकसान की तस्वीर और स्पष्ट होने की उम्मीद है।
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