पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी अब अपने सबसे बड़े राजनीतिक संकट का सामना करती दिखाई दे रही है। दावा किया जा रहा है कि लोकसभा में पार्टी के 28 सांसदों में से 22 सांसद बगावत पर उतर आए हैं और अलग संसदीय समूह बनाकर केंद्र की एनडीए सरकार को समर्थन देने की तैयारी में हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल पश्चिम बंगाल बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी हलचल मचा दी है। बागी सांसदों के इस गुट का नेतृत्व वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार कर रही हैं। उन्होंने दावा किया है कि पहले उनके साथ 20 सांसद थे, लेकिन अब दो और सांसद इस गुट में शामिल हो चुके हैं, जिससे उनकी संख्या बढ़कर 22 हो गई है।
जानकारी के मुताबिक यह बागी गुट सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात करेगा। सांसदों की मांग है कि उन्हें संसद में अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता दी जाए। इसके साथ ही वे खुद को ‘मूल तृणमूल कांग्रेस’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।
इस बीच एक दस्तावेज भी सामने आया है, जिसमें कई टीएमसी सांसदों के हस्ताक्षर होने का दावा किया जा रहा है। इन सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर संसद में अलग बैठने की व्यवस्था और स्वतंत्र पहचान देने की मांग की है।
राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि बागी सांसदों ने संकेत दिए हैं कि यदि उन्हें अलग पहचान मिलती है तो वे केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन को समर्थन दे सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो यह ममता बनर्जी के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जाएगा।
हालांकि टीएमसी नेतृत्व इस पूरे घटनाक्रम को लेकर सतर्क नजर आ रहा है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर किसी भी अलग गुट को मान्यता नहीं देने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस एकजुट है और बगावत के दावों की सत्यता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
वहीं, पार्टी के कई बड़े और प्रभावशाली नेता अब भी ममता बनर्जी के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में यह साफ नहीं है कि यह बगावत आखिर किस मोड़ तक पहुंचेगी और इसका टीएमसी की राजनीतिक स्थिति पर कितना असर पड़ेगा।
फिलहाल, बंगाल की राजनीति में मचे इस घमासान ने देशभर का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अब सभी की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष के फैसले और बागी सांसदों के अगले कदम पर टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में यह मामला पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा बदल सकता है।
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