बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के मोतिहारी से इंसानियत को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। यहां एक नवजात बच्चे की कथित खरीद-बिक्री का खुलासा होने के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए बच्चे को सकुशल बरामद कर लिया। इस मामले में बच्चे के माता-पिता, कथित खरीदार और एक आशा कर्मी समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है।
पुलिस के सामने मामला तब आया जब नवजात की खरीद-बिक्री से जुड़ी जानकारी मिली। सूचना मिलते ही पुलिस ने पूरे मामले की जांच शुरू की और संबंधित ठिकानों पर छापेमारी की। कार्रवाई के दौरान पुलिस टीम ने नवजात को सुरक्षित बरामद कर लिया।
जांच में कथित तौर पर सामने आया कि बच्चे की डील करीब 4.50 लाख रुपये में हुई थी। हैरान करने वाली बात यह बताई जा रही है कि इस रकम में से बच्चे के माता-पिता को कथित तौर पर सिर्फ डेढ़ लाख रुपये दिए गए थे। बाकी रकम किन लोगों के बीच बांटी गई और इस पूरी डील में किस-किस की भूमिका थी, पुलिस इसकी जांच कर रही है।
मामले में आशा कर्मी का नाम सामने आने के बाद जांच और गंभीर हो गई है। स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े किसी व्यक्ति पर अगर इस तरह के गंभीर आरोप लगते हैं तो यह पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करता है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कथित तौर पर बच्चे की खरीद-बिक्री की योजना कैसे बनाई गई और इसमें अन्य कौन-कौन लोग शामिल थे।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक नवजात बच्चे को बेचने की नौबत क्यों आई। क्या परिवार आर्थिक तंगी से परेशान था या फिर किसी ने उन्हें पैसे का लालच देकर इस काम के लिए तैयार किया? पुलिस पूछताछ में इन सभी सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश कर रही है।
बताया जा रहा है कि कथित सौदे में बच्चे को एक व्यक्ति को दिया गया था। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए उस कथित खरीदार को भी गिरफ्तार किया है। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि खरीदार ने बच्चा क्यों लिया था और क्या इस पूरे मामले के पीछे किसी बड़े नेटवर्क की भूमिका है।
पुलिस के लिए यह जांच करना भी जरूरी है कि बच्चे की पहचान और उसके जन्म से जुड़े दस्तावेजों के साथ कोई छेड़छाड़ तो नहीं की गई। नवजात को किस परिस्थिति में माता-पिता से अलग किया गया और उसे किसके हवाले किया गया, इन सभी पहलुओं की जांच की जा रही है।
इस पूरे मामले में बच्चे का सकुशल मिलना सबसे बड़ी राहत की बात है। पुलिस ने उसे बरामद करने के बाद उसकी सुरक्षा और देखभाल को प्राथमिकता दी है। वहीं गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ कर कथित खरीद-बिक्री के पूरे नेटवर्क का पता लगाने की कोशिश की जा रही है।
इस घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि आर्थिक मजबूरी और लालच के बीच मासूम बच्चों की जिंदगी को सौदे का हिस्सा कैसे बनाया जा सकता है। नवजात खुद अपनी सुरक्षा के लिए कुछ नहीं कर सकता, इसलिए उसकी जिम्मेदारी परिवार और समाज पर होती है।
अगर पुलिस की जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला सिर्फ एक बच्चे की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें शामिल सभी लोगों की भूमिका और कथित नेटवर्क की भी जांच जरूरी होगी। खासकर आशा कर्मी की भूमिका सामने आने के बाद पुलिस इस एंगल पर भी जांच कर सकती है कि क्या उसने परिवार और कथित खरीदार के बीच संपर्क कराने में कोई भूमिका निभाई थी।
फिलहाल पुलिस ने बच्चे को बरामद कर लिया है और आरोपियों को गिरफ्तार कर मामले की जांच आगे बढ़ाई जा रही है। 4.50 लाख रुपये की कथित डील, माता-पिता को मिले डेढ़ लाख और बाकी रकम के पीछे छिपी कहानी अब जांच का अहम हिस्सा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस मासूम बच्चे का सौदा क्यों किया गया और इस कथित खरीद-बिक्री में कितने लोग शामिल थे? पुलिस की जांच आगे बढ़ने के साथ इस शर्मनाक मामले की पूरी तस्वीर सामने आने की उम्मीद है।
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