देश के कई हिस्सों में डेंगू के मामले सामने आने के बीच मरीजों और उनके परिवारों की सबसे बड़ी चिंता अक्सर प्लेटलेट्स को लेकर होती है। डेंगू की जांच के दौरान प्लेटलेट्स कम होने पर लोग तुरंत घबरा जाते हैं और इन्हें बढ़ाने के लिए अलग-अलग घरेलू उपाय या दवाएं तलाशने लगते हैं। लेकिन डेंगू में प्लेटलेट्स का कम होना बीमारी के दौरान होने वाला एक सामान्य बदलाव हो सकता है और केवल प्लेटलेट्स की संख्या देखकर मरीज की हालत की गंभीरता तय नहीं की जाती। मरीज की पूरी क्लिनिकल स्थिति, ब्लीडिंग, ब्लड प्रेशर, हेमाटोक्रिट और अन्य लक्षणों को भी देखना जरूरी होता है।
डेंगू वायरस के संक्रमण के दौरान शरीर में प्लेटलेट्स की संख्या कम हो सकती है। इसका कारण कई प्रक्रियाओं का एक साथ प्रभावित होना माना जाता है, जिसमें प्लेटलेट्स का कम बनना और उनका तेजी से नष्ट या इस्तेमाल होना शामिल है। डेंगू में प्लेटलेट्स की कमी बीमारी के दौरान अक्सर देखी जाती है और यह बीमारी के तीसरे से आठवें दिन के बीच भी सामने आ सकती है।
प्लेटलेट्स हमारे शरीर में खून का थक्का बनाने और रक्तस्राव को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए इनकी संख्या कम होने पर ब्लीडिंग का खतरा चिंता का विषय बन सकता है। हालांकि, हर मरीज में प्लेटलेट्स कम होने का मतलब यह नहीं होता कि वह गंभीर स्थिति में पहुंच गया है। डेंगू की गंभीरता का आकलन करते समय लगातार उल्टी, तेज पेट दर्द, नाक या मसूड़ों से खून आना, खून की उल्टी या मल में खून, अत्यधिक कमजोरी, बेचैनी और सांस लेने में परेशानी जैसे चेतावनी संकेतों पर भी ध्यान दिया जाता है।
डेंगू में प्लेटलेट्स कम होने के दौरान सबसे जरूरी है कि मरीज की नियमित चिकित्सकीय निगरानी हो। डॉक्टर जरूरत के अनुसार CBC और अन्य जांचों के जरिए प्लेटलेट्स के साथ-साथ हेमाटोक्रिट और मरीज की सामान्य स्थिति पर नजर रखते हैं। खासतौर पर बुखार कम होने के आसपास का समय महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि डेंगू का क्रिटिकल फेज अक्सर इसी अवधि में शुरू होता है और कुछ मरीजों की हालत तेजी से बिगड़ सकती है।
अब सवाल यह है कि क्या प्लेटलेट्स को तुरंत बढ़ाया जा सकता है? इसका जवाब यह है कि डेंगू में सिर्फ प्लेटलेट्स की संख्या बढ़ाने के लिए प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन हर मरीज को देने की सलाह नहीं दी जाती। केवल कम प्लेटलेट काउंट के आधार पर प्लेटलेट चढ़ाना जरूरी नहीं माना जाता, खासकर जब मरीज में सक्रिय रक्तस्राव न हो।
अगर मरीज को महत्वपूर्ण सक्रिय रक्तस्राव हो रहा है या डॉक्टर को गंभीर ब्लीडिंग का खतरा दिखाई देता है, तो अस्पताल में मरीज की स्थिति के अनुसार ब्लड प्रोडक्ट्स देने का फैसला किया जा सकता है। इसलिए प्लेटलेट्स चढ़ाने या न चढ़ाने का निर्णय केवल रिपोर्ट में लिखी एक संख्या देखकर नहीं, बल्कि मरीज की पूरी स्थिति देखकर डॉक्टर करते हैं।
डेंगू के दौरान मरीज को पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ लेने, आराम करने और डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित जांच कराने पर ध्यान देना चाहिए। बुखार या दर्द के लिए दवा भी डॉक्टर की सलाह से ही लें। एस्पिरिन और इबुप्रोफेन जैसी कुछ दर्द निवारक दवाओं से बचने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इनसे रक्तस्राव का खतरा बढ़ सकता है। बुखार और दर्द के लिए पैरासिटामोल का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन इसकी मात्रा डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही रखनी चाहिए।
इसलिए डेंगू में प्लेटलेट्स कम होने पर सबसे जरूरी बात घबराना नहीं, बल्कि मरीज की स्थिति पर नजर रखना है। अगर नाक या मसूड़ों से खून आए, पेट में तेज दर्द हो, लगातार उल्टियां हों, खून की उल्टी या काला मल आए, अत्यधिक कमजोरी या बेचैनी महसूस हो या सांस लेने में परेशानी हो तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। ऐसे चेतावनी संकेतों को केवल प्लेटलेट्स की रिपोर्ट से ज्यादा गंभीरता से लेना जरूरी है।
डेंगू में प्लेटलेट्स बीमारी के साथ कम और फिर धीरे-धीरे बढ़ सकते हैं। इसलिए किसी घरेलू नुस्खे के भरोसे रहने या बिना डॉक्टर की सलाह के दवा लेने के बजाय मरीज की नियमित मेडिकल निगरानी सबसे महत्वपूर्ण है। प्लेटलेट्स की संख्या के साथ मरीज के लक्षण और पूरी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखकर ही उपचार का फैसला किया जाना चाहिए।
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