लो स्पर्म काउंट यानी पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या कम होना, कपल्स में प्रेग्नेंसी में देरी की एक महत्वपूर्ण वजह हो सकती है। ऐसी स्थिति सामने आने पर कई कपल्स के मन में सबसे बड़ा सवाल होता है कि IUI यानी Intrauterine Insemination बेहतर रहेगा या IVF यानी In Vitro Fertilization का सहारा लेना चाहिए। हालांकि, इसका कोई एक जवाब सभी कपल्स के लिए समान नहीं होता, क्योंकि फर्टिलिटी ट्रीटमेंट का चुनाव कई मेडिकल फैक्टर्स को ध्यान में रखकर किया जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, सबसे पहले पुरुष की सीमेन रिपोर्ट और महिला की फर्टिलिटी से जुड़ी स्थिति का मूल्यांकन किया जाता है। सीमेन एनालिसिस में स्पर्म काउंट के साथ-साथ स्पर्म की मोटिलिटी और आकार जैसी चीजों को भी देखा जाता है। इसके अलावा महिला की उम्र, ओव्यूलेशन, फैलोपियन ट्यूब की स्थिति और अन्य प्रजनन संबंधी कारणों को भी ध्यान में रखा जाता है। इन सभी रिपोर्ट्स के आधार पर डॉक्टर यह तय करते हैं कि प्राकृतिक तरीके से प्रयास जारी रखना उचित है या किसी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव तकनीक की जरूरत है।
IUI अपेक्षाकृत सरल और कम खर्च वाला फर्टिलिटी ट्रीटमेंट माना जाता है। इसमें महिला के ओव्यूलेशन के समय तैयार किए गए स्पर्म को सीधे गर्भाशय में पहुंचाया जाता है, जिससे स्पर्म को अंडे तक पहुंचने का रास्ता कुछ आसान हो जाता है। कुछ मामलों में हल्के या मध्यम स्तर के पुरुष बांझपन, अस्पष्ट कारणों वाली बांझपन या ओव्यूलेशन से जुड़ी समस्याओं में डॉक्टर IUI की सलाह दे सकते हैं। हालांकि, IUI की सफलता कई परिस्थितियों पर निर्भर करती है और हर प्रयास में गर्भधारण की गारंटी नहीं होती।
वहीं IVF एक अधिक उन्नत प्रक्रिया है। इसमें महिला के अंडों को निकालकर प्रयोगशाला में स्पर्म के साथ निषेचित किया जाता है और तैयार भ्रूण को गर्भाशय में स्थानांतरित किया जाता है। पुरुष में स्पर्म की संख्या या गुणवत्ता काफी कम होने जैसी स्थितियों में, या जब IUI से अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हों, डॉक्टर IVF पर विचार कर सकते हैं। कुछ मामलों में ICSI नामक तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें एक चुने हुए स्पर्म को सीधे अंडे के अंदर इंजेक्ट किया जाता है।
खर्च की बात करें तो आमतौर पर IUI, IVF की तुलना में कम महंगा होता है। लेकिन केवल कम लागत को देखकर उपचार का चुनाव करना सही नहीं माना जाता। यदि किसी कपल की मेडिकल स्थिति ऐसी है जिसमें IUI से सफलता की संभावना कम है, तो बार-बार IUI कराने से समय और पैसा दोनों खर्च हो सकते हैं। दूसरी ओर, उचित स्थिति में IUI एक सरल और किफायती विकल्प हो सकता है।
सफलता दर भी हर कपल में अलग हो सकती है। महिला की उम्र, अंडों की गुणवत्ता, स्पर्म की स्थिति, गर्भाशय और फैलोपियन ट्यूब की स्थिति तथा अन्य मेडिकल कारण उपचार के परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए इंटरनेट पर उपलब्ध किसी सामान्य सफलता दर को अपनी व्यक्तिगत संभावना मानना उचित नहीं है।
विशेषज्ञ आमतौर पर सलाह देते हैं कि लो स्पर्म काउंट की समस्या सामने आने पर केवल एक रिपोर्ट के आधार पर निष्कर्ष न निकालें। डॉक्टर जरूरत पड़ने पर दोबारा सीमेन एनालिसिस और अन्य जांच कराने की सलाह दे सकते हैं। साथ ही महिला की फर्टिलिटी की जांच भी जरूरी होती है, क्योंकि गर्भधारण में पुरुष और महिला दोनों से जुड़े कारण भूमिका निभा सकते हैं।
इसलिए IUI और IVF में से कौन सा उपचार बेहतर है, इसका फैसला उम्र, मेडिकल हिस्ट्री, स्पर्म की संख्या और गुणवत्ता, महिला की फर्टिलिटी और पहले किए गए उपचारों के परिणामों को देखकर किया जाना चाहिए। कुछ कपल्स के लिए IUI पहला विकल्प हो सकता है, जबकि गंभीर स्पर्म समस्या या अन्य जटिल परिस्थितियों में IVF या ICSI अधिक उपयुक्त माना जा सकता है। फर्टिलिटी उपचार शुरू करने से पहले किसी योग्य फर्टिलिटी विशेषज्ञ से व्यक्तिगत सलाह लेना सबसे जरूरी है।
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