दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक ताकत का संतुलन तेजी से बदल रहा है। इसी बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक बड़ा बयान देकर वैश्विक मंच पर नई बहस छेड़ दी है। पुतिन ने कहा है कि ब्रिक्स देशों का समूह आर्थिक आकार के मामले में जी7 देशों को पीछे छोड़ चुका है और आने वाले वर्षों में इसकी ताकत और बढ़ने वाली है।
सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम यानी SPIEF में बोलते हुए पुतिन ने कहा कि दुनिया की विकास संरचना अब धीरे-धीरे ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों की ओर स्थानांतरित हो रही है। उनके अनुसार ब्रिक्स देश आज नए आर्थिक विकास केंद्र के रूप में उभर रहे हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उनकी भूमिका लगातार मजबूत हो रही है।
रूसी राष्ट्रपति ने दावा किया कि पिछले पांच वर्षों में वैश्विक जीडीपी वृद्धि का लगभग 49 प्रतिशत योगदान ब्रिक्स देशों का रहा है, जबकि जी7 देशों का योगदान केवल करीब 18 प्रतिशत रहा। पुतिन ने कहा कि यह आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि आर्थिक शक्ति का केंद्र अब पश्चिमी देशों से हटकर उभरती अर्थव्यवस्थाओं की ओर बढ़ रहा है।
आपको बता दें कि ब्रिक्स समूह की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ हुई थी। लेकिन समय के साथ इसका दायरा बढ़ता गया। अब मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया और संयुक्त अरब अमीरात भी इस संगठन का हिस्सा बन चुके हैं। सदस्य देशों की बढ़ती संख्या और उनकी आर्थिक क्षमता ने ब्रिक्स को वैश्विक राजनीति और व्यापार में एक महत्वपूर्ण मंच बना दिया है।
पुतिन का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार ब्रिक्स की आलोचना कर रहे हैं। ट्रम्प पहले भी ब्रिक्स को अमेरिकी डॉलर के लिए संभावित खतरा बता चुके हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने ब्रिक्स देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की चेतावनी भी दी थी, यदि यह समूह डॉलर के विकल्प को बढ़ावा देने की दिशा में आगे बढ़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और वित्तीय सहयोग को मजबूत करने की कोशिशें वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में बदलाव का संकेत हैं। हालांकि डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे प्रभावशाली मुद्रा बना हुआ है, लेकिन ब्रिक्स देशों की बढ़ती आर्थिक हिस्सेदारी भविष्य में नए समीकरण बना सकती है।
फिलहाल, पुतिन का यह बयान केवल रूस की राय नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे उस व्यापक बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है जिसमें विकासशील देशों की आवाज और प्रभाव लगातार मजबूत हो रहा है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ब्रिक्स वास्तव में वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में जी7 को चुनौती देने में सफल होता है या नहीं।
![]()

