भारतीय शेयर बाजार के लिए एक अहम संकेत सामने आया है। करीब 25 वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ है जब उभरते बाजारों के सबसे प्रभावशाली वैश्विक सूचकांक में किसी भी भारतीय कंपनी को शीर्ष 10 कंपनियों में जगह नहीं मिली है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल रैंकिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर विदेशी निवेश और भारतीय पूंजी बाजार पर भी पड़ सकता है।
ताजा आंकड़ों के अनुसार, एमएससीआई इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स में भारत की दो सबसे बड़ी कंपनियां एचडीएफसी बैंक और रिलायंस इंडस्ट्रीज अब क्रमशः 11वें और 12वें स्थान पर पहुंच गई हैं। मार्च 2026 में ये कंपनियां सातवें और आठवें स्थान पर थीं, लेकिन हाल के महीनों में इनके भारांश में लगातार गिरावट दर्ज की गई है।
क्यों घटी भारतीय कंपनियों की हिस्सेदारी?
विशेषज्ञों के मुताबिक वैश्विक निवेशकों का झुकाव तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और टेक्नोलॉजी कंपनियों की ओर बढ़ रहा है। AI सेक्टर में निवेश की बढ़ती मांग के कारण निवेशकों ने पारंपरिक क्षेत्रों से पूंजी निकालकर तकनीकी कंपनियों में लगानी शुरू कर दी है।
इसी वजह से भारतीय कंपनियों का वेटेज घटा है और भारत की कुल हिस्सेदारी भी एमएससीआई इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स में घटकर 10.87 प्रतिशत रह गई है, जो पिछले छह वर्षों का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है।
विदेशी निवेश पर क्या पड़ेगा असर?
एमएससीआई सूचकांक का उपयोग दुनिया भर के बड़े संस्थागत और विदेशी निवेशक निवेश संबंधी फैसले लेने के लिए करते हैं। इस सूचकांक से जुड़े निष्क्रिय निवेश कोषों (Passive Funds) में 700 अरब डॉलर से अधिक की संपत्ति निवेशित है।
जब किसी देश या कंपनी का वेटेज घटता है तो इन फंड्स को भी अपने निवेश का अनुपात कम करना पड़ता है। ऐसे में भारत में विदेशी पूंजी का प्रवाह प्रभावित हो सकता है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि सक्रिय निवेश प्रबंधकों के लिए भी अब भारत में निवेश कम करना पहले की तुलना में आसान हो सकता है।
घरेलू निवेश में भी दिखी नरमी
भारतीय शेयर बाजार पर दबाव ऐसे समय में बढ़ा है जब घरेलू निवेश में भी कुछ कमी देखने को मिली है। म्यूचुअल फंड उद्योग के आंकड़ों के अनुसार मई महीने में इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेश घटकर 22,908 करोड़ रुपये रह गया, जो पिछले एक साल का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है।
कच्चे तेल और वैश्विक तनाव से बढ़ी चिंता
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है, इसलिए तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से आयात बिल और विदेशी मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
सरकार कर रही है तैयारी
विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए केंद्र सरकार ने हाल के महीनों में कई सुधारों की घोषणा की है। इनमें विदेशी निवेशकों को कर राहत, बॉन्ड बाजार में निवेश के नए अवसर और विदेशी मुद्रा जमा को बढ़ावा देने वाले कदम शामिल हैं।
इसके अलावा भारत को एक प्रमुख वैश्विक बॉन्ड इंडेक्स में शामिल किए जाने को लेकर भी फैसला जल्द आने की संभावना है। यदि भारत को इसमें जगह मिलती है तो अनुमानित 25 अरब डॉलर तक का नया विदेशी निवेश देश में आ सकता है।
फिलहाल निवेशकों और नीति निर्माताओं की नजर इसी फैसले पर टिकी हुई है, क्योंकि यह आने वाले वर्षों में भारत के पूंजी प्रवाह और शेयर बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
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