पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव 2026 की घोषणा के साथ ही राज्य की राजनीति गरमा गई है। मुख्यमंत्री Mamata Banerjee लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी के लिए पूरी ताकत लगा रही हैं, लेकिन इस बार उनकी राह पहले जितनी आसान नहीं मानी जा रही है। भारतीय जनता पार्टी भी इस बार बंगाल में सरकार बनाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है, जबकि कांग्रेस और वामपंथी दल भी मैदान में मजबूती से उतर चुके हैं।
चुनाव से पहले प्रवर्तन निदेशालय यानी Enforcement Directorate की छापेमारी और घोटालों की जांच ने बंगाल की राजनीति को और गरमा दिया है। आई-पैक प्रकरण को लेकर ईडी की कार्रवाई के बाद से कोलकाता से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इस मामले में तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और चुनावी रणनीति से जुड़े लोगों पर जांच एजेंसियों की नजर है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव से पहले इस तरह की कार्रवाई का सीधा असर चुनावी माहौल पर पड़ता है। हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि इन मामलों की जांच लंबे समय से चल रही थी और अदालत से भी जांच को मंजूरी मिल चुकी है।
इस पूरे मामले में चुनावी रणनीतिकार Prashant Kishor का नाम भी चर्चा में है, क्योंकि आई-पैक और तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। वहीं तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है।
बंगाल की राजनीति में कानून व्यवस्था, संदेशखाली मामला, आरजी कर अस्पताल कांड, कोयला घोटाला, स्कूल भर्ती घोटाला और शारदा चिटफंड घोटाला जैसे मुद्दे चुनाव में बड़े मुद्दे बन सकते हैं। विपक्ष इन सभी मामलों को लेकर ममता सरकार को घेरने की तैयारी में है।
दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि यह सब राजनीतिक साजिश का हिस्सा है और चुनाव से पहले उनकी छवि खराब करने की कोशिश की जा रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले भी कई बार जांच एजेंसियों की कार्रवाई का विरोध कर चुकी हैं और इसे संघीय ढांचे पर हमला बता चुकी हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बंगाल चुनाव 2026 सिर्फ एक राज्य का चुनाव नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाला चुनाव भी साबित हो सकता है। अब देखना यह होगा कि अदालत का फैसला, जांच एजेंसियों की कार्रवाई और चुनावी रणनीति — इन सबके बीच ममता बनर्जी चौथी बार सत्ता में वापसी कर पाती हैं या नहीं।
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