Sunday, November 1, 2026
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अयोध्या के 10वें दीपोत्सव में दिखेगा अंतरराष्ट्रीय रामलीला का रंग, 12 मंचों पर 2500 कलाकार करेंगे रामकथा का मंचन

अयोध्या में इस बार दीपोत्सव केवल दीपों की रोशनी और भव्य सजावट तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि भगवान श्रीराम की कथा के जरिए दुनिया की अलग-अलग संस्कृतियों का संगम भी देखने को मिल सकता है। सरयू तट पर जलने वाले दीपों के साथ रामकथा के प्रसंग विभिन्न देशों की पारंपरिक कला और अभिनय शैली में मंच पर उतरेंगे। उत्तर प्रदेश सरकार की तैयारियों के अनुसार, अयोध्या में आयोजित होने वाले 10वें दीपोत्सव में भारत के साथ विदेशों के कलाकार भी रामलीला का मंचन करेंगे। इस आयोजन में करीब 2,500 कलाकारों के शामिल होने की योजना है, जो शहर के 12 अलग-अलग मंचों पर अपनी प्रस्तुतियां देंगे। खास बात यह है कि इस बार रामलीला के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भगवान श्रीराम की कथा और भारतीय सांस्कृतिक विरासत को प्रस्तुत करने की तैयारी की जा रही है।

दीपोत्सव में दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका, नेपाल, लाओस और थाईलैंड के कलाकारों को आमंत्रित करने का प्रस्ताव है। इन देशों के कलाकार अपनी-अपनी पारंपरिक शैली में रामकथा के प्रसंगों का मंचन कर सकते हैं। अलग-अलग देशों में रामायण की कथा सदियों से लोकजीवन, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का हिस्सा रही है। इसी वजह से वहां रामलीला के मंचन का तरीका भी भारत से कुछ अलग दिखाई देता है। कहीं नृत्य और संगीत के जरिए रामकथा प्रस्तुत की जाती है, तो कहीं पारंपरिक वेशभूषा, मुखौटों और विशेष अभिनय शैली का इस्तेमाल होता है। ऐसे में अयोध्या के दर्शकों को एक ही आयोजन में रामायण की विभिन्न सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां देखने का अवसर मिल सकता है।

इस आयोजन में दक्षिण अफ्रीका की भागीदारी भी विशेष आकर्षण बन सकती है। जानकारी के अनुसार, दक्षिण अफ्रीका से दो रामलीला दलों के दीपोत्सव में शामिल होने का प्रस्ताव है। ये दल अपनी प्रस्तुति के माध्यम से वहां प्रचलित रामायण परंपरा और सांस्कृतिक जुड़ाव को दर्शा सकते हैं। इसके अलावा श्रीलंका, नेपाल, लाओस और थाईलैंड के कलाकारों की भागीदारी की तैयारी भी की जा रही है। इन देशों में रामायण से जुड़ी कई सांस्कृतिक परंपराएं प्रचलित हैं। नेपाल में रामकथा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है, जबकि श्रीलंका में रामायण से जुड़े प्रसंगों को लेकर अलग-अलग मान्यताएं और परंपराएं देखने को मिलती हैं। थाईलैंड और लाओस में भी रामायण की कथाओं ने स्थानीय कला और साहित्य को प्रभावित किया है।

अयोध्या के दीपोत्सव को और अधिक अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देने के लिए फिलीपींस और रूस के कलाकारों को भी आमंत्रित करने की तैयारी चल रही है। हालांकि, इन दोनों देशों के कलाकारों की भागीदारी अभी अंतिम रूप से तय नहीं हुई है। यदि इन देशों के कलाकार भी आयोजन में शामिल होते हैं, तो इस बार दीपोत्सव का सांस्कृतिक दायरा और व्यापक हो सकता है। अलग-अलग देशों के कलाकारों की प्रस्तुतियां दर्शकों को यह समझने का अवसर देंगी कि भगवान श्रीराम की कथा भारत की सीमाओं से आगे बढ़कर दुनिया के कई हिस्सों में किस तरह अलग-अलग रूपों में जीवित है।

इस बार आयोजन के लिए कुल 12 मंच तैयार करने की योजना है। इन मंचों पर भारत और विदेश से आए करीब 2,500 कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे। इतने बड़े स्तर पर कलाकारों की भागीदारी से दीपोत्सव के दौरान अयोध्या का सांस्कृतिक वातावरण और भी भव्य हो सकता है। हर मंच पर अलग-अलग रामलीला दलों को अपनी कला दिखाने का अवसर मिलेगा। दर्शक एक स्थान पर रहते हुए विभिन्न देशों की अभिनय परंपराओं, संगीत, नृत्य और वेशभूषा के माध्यम से रामकथा के अलग-अलग रूप देख सकेंगे। इससे आयोजन केवल धार्मिक कार्यक्रम न रहकर सांस्कृतिक आदान-प्रदान का बड़ा मंच भी बन सकता है।

अयोध्या में दीपोत्सव का आयोजन भगवान श्रीराम के प्रति श्रद्धा और उनकी नगरी की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हुआ है। हर वर्ष इस आयोजन में बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं और दीपों की सजावट के साथ विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आकर्षण का केंद्र रहते हैं। इस बार विदेशी कलाकारों को शामिल करने की योजना से आयोजन को वैश्विक पहचान देने की कोशिश की जा रही है। रामलीला के माध्यम से अलग-अलग देशों की सांस्कृतिक परंपराओं को एक मंच पर लाना इस आयोजन की विशेष उपलब्धि हो सकती है।

हालांकि, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका, नेपाल, लाओस और थाईलैंड के कलाकारों की भागीदारी का प्रस्ताव सामने आया है, जबकि फिलीपींस और रूस के कलाकारों को बुलाने की प्रक्रिया अभी तैयारी के स्तर पर है। इसलिए अंतिम कार्यक्रम और शामिल होने वाले दलों की संख्या की आधिकारिक पुष्टि का इंतजार रहेगा। अब लोगों की नजर इस बात पर है कि 10वें दीपोत्सव में कौन-कौन से देश अपने कलाकारों के साथ अयोध्या पहुंचते हैं और 12 मंचों पर रामकथा के कितने अनोखे रंग देखने को मिलते हैं। यदि प्रस्तावित तैयारियां पूरी होती हैं, तो अयोध्या का यह दीपोत्सव भक्ति, परंपरा और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संगम का यादगार आयोजन बन सकता है।

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