मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश। सावन माह में चल रही कांवड़ यात्रा के दौरान उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने लोगों को पौराणिक कथा के श्रवण कुमार की याद दिला दी। यहां दूल्हेरा गांव के रहने वाले यशवीर अपनी 70 वर्षीय मां और 65 वर्षीय चाची को कांवड़ के दोनों पलड़ों में बैठाकर हरिद्वार से पैदल यात्रा कर रहे हैं। करीब 115 किलोग्राम वजन उठाकर चल रहे यशवीर की इस अनोखी कांवड़ यात्रा की चर्चा पूरे इलाके में हो रही है।
हर की पौड़ी से शुरू की अनोखी कांवड़ यात्रा
जानकारी के अनुसार, यशवीर ने 24 जुलाई को हरिद्वार स्थित हर की पौड़ी से गंगाजल उठाया। इसके बाद उन्होंने अपनी कांवड़ के एक पलड़े में अपनी 70 वर्षीय मां कृष्णा देवी और दूसरे पलड़े में 65 वर्षीय चाची फूलो को बैठाकर पैदल यात्रा शुरू की।
यात्रा के दौरान मां, चाची और कांवड़ का कुल वजन लगभग 115 किलोग्राम बताया जा रहा है। इसके बावजूद यशवीर पूरे श्रद्धा भाव के साथ अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ लगातार यात्रा कर रहे हैं।
माता-पिता की सेवा का दिया संदेश
यशवीर का कहना है कि उनकी इस यात्रा का उद्देश्य केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि समाज को एक महत्वपूर्ण संदेश देना भी है। उन्होंने कहा कि आज के समय में कई लोग अपने माता-पिता की उपेक्षा करते हैं, जबकि माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्म है।
उन्होंने लोगों से अपील की कि सभी को अपने माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान करना चाहिए तथा उनकी देखभाल को अपनी जिम्मेदारी समझना चाहिए।
शिवरात्रि पर करेंगे जलाभिषेक
यशवीर ने बताया कि उनकी यात्रा हरिद्वार से शुरू होकर मुजफ्फरनगर के रास्ते शाहपुर क्षेत्र के दूल्हेरा गांव पहुंचेगी। वहां स्थित गांव के शिवालय में शिवरात्रि के अवसर पर भगवान शिव का गंगाजल से जलाभिषेक किया जाएगा।
उन्होंने यह भी बताया कि इससे पहले भी वह कई बार अपने गांव के शिवालय में गंगाजल अर्पित कर चुके हैं और हर वर्ष श्रद्धा के साथ कांवड़ यात्रा में शामिल होते हैं।
सोशल मीडिया पर हो रही सराहना
यशवीर की इस अनोखी कांवड़ यात्रा की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से साझा किए जा रहे हैं। लोग उन्हें ‘कलयुग का श्रवण कुमार’ कहकर उनकी सराहना कर रहे हैं। कई लोगों का मानना है कि आज के दौर में बुजुर्गों के प्रति सम्मान और सेवा का ऐसा उदाहरण समाज के लिए प्रेरणादायक है।
हालांकि, ‘कलयुग का श्रवण कुमार’ एक लोकप्रिय उपमा है, न कि कोई आधिकारिक उपाधि।
सेवा और संस्कार का संदेश
सावन की कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और पारिवारिक मूल्यों को भी मजबूत करने का अवसर मानी जाती है। यशवीर की यह पहल लोगों को यह संदेश देती है कि माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान है।
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