Supreme Court of India ने देशभर में लंबित बेल याचिकाओं और न्यायिक प्रक्रिया में हो रही देरी को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने विशेष रूप से Madhya Pradesh हाईकोर्ट में लंबित 63 हजार से अधिक बेल आवेदनों का उल्लेख करते हुए इसे “चिंताजनक स्थिति” बताया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लगभग एक वर्ष पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में बड़ी संख्या में बेल आवेदन लंबित थे। हालांकि अदालत ने उम्मीद जताई कि तब से काफी मामलों का निपटारा किया गया होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियों को किसी हाईकोर्ट की आलोचना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इन सुझावों का उद्देश्य न्यायिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना है।
सुप्रीम कोर्ट ने बेल मामलों के त्वरित निपटारे के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। अदालत ने कहा कि बेल याचिकाओं की लिस्टिंग साप्ताहिक या पखवाड़े के आधार पर ऑटोमेटेड सॉफ्टवेयर प्रणाली से की जानी चाहिए। साथ ही पहली सुनवाई से पहले स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करना अनिवार्य किया जाए।
अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि बेल याचिका की अग्रिम प्रति एडवोकेट जनरल या संबंधित सरकारी एजेंसी को उपलब्ध कराई जाए, ताकि सुनवाई में अनावश्यक देरी न हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नई बेल याचिकाओं को अधिकतम एक सप्ताह के भीतर सूचीबद्ध किया जाना चाहिए।
पीठ ने यह भी कहा कि जिन मामलों की सुनवाई नहीं हो पाती, उन्हें स्वतः दोबारा सूचीबद्ध किया जाए और उनके निपटारे के लिए बाहरी समयसीमा तय की जाए। अदालत ने सरकारी वकीलों द्वारा बार-बार मांगे जाने वाले अनावश्यक स्थगनों पर भी चिंता जताई और इसे हतोत्साहित करने की जरूरत बताई।
सुप्रीम कोर्ट ने एनडीपीएस कानून के तहत मामलों में फॉरेंसिक रिपोर्ट मिलने में हो रही देरी पर भी चिंता व्यक्त की। अदालत ने हाईकोर्ट्स के मुख्य न्यायाधीशों से राज्य सरकारों और संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय कर यह सुनिश्चित करने को कहा कि फॉरेंसिक साइंस लैब की रिपोर्ट समय पर उपलब्ध हो।
इसके अलावा अदालत ने पीड़ितों के अधिकारों पर भी जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि पीड़ित-केंद्रित मामलों में जांच अधिकारी यह सुनिश्चित करें कि पीड़ित कार्यवाही में भाग ले सकें और जरूरत पड़ने पर उन्हें विधिक सहायता वकील भी उपलब्ध कराया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी की बेल याचिका सहित हर चरण में पीड़ित को सुने जाने का अधिकार है। साथ ही अदालत ने डिजिटल पोर्टल के माध्यम से स्टेटस रिपोर्ट अपलोड करने का सुझाव भी दिया, ताकि सुनवाई प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और सुचारु हो सके।
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