धर्मनगरी वाराणसी में रंगभरी एकादशी के साथ होली महापर्व की शुरुआत हो चुकी है। इस परंपरा की शुरुआत काशी विश्वनाथ मंदिर में बाबा के ‘गौना’ से होती है, जिसके बाद पूरे शहर में होली का उल्लास देखने को मिलता है।
महाश्मशान में अघोरियों की अनोखी होली
काशी के प्रसिद्ध हरिश्चंद्र घाट स्थित महाश्मशान घाट पर एक अद्भुत दृश्य देखने को मिला, जहां अघोरी और तांत्रिकों ने जलती चिताओं के बीच भस्म से होली खेली। यह परंपरा काशी की आध्यात्मिक और रहस्यमयी संस्कृति का प्रतीक मानी जाती है, जो जीवन और मृत्यु के दर्शन को एक साथ प्रस्तुत करती है।
देश-विदेश से पहुंचे सैलानी
इस अनोखी होली को देखने के लिए देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचे। भूत-पिशाच के रूप में सजे कलाकारों और अघोरियों की टोली के साथ यह दृश्य बेहद आकर्षक और रोमांचक नजर आया। सैलानी इस खास पल को अपने कैमरों में कैद करते दिखे।
युवाओं में दिखा खास उत्साह
‘होली खेले मसाने में’ जैसे पारंपरिक गीतों पर विदेशी सैलानी और स्थानीय युवा झूमते नजर आए। कुछ युवतियों ने भी श्मशान घाट पर नृत्य कर इस अनोखे आयोजन में अपनी भागीदारी दर्ज कराई। भस्म की होली का खासा उत्साह युवा पीढ़ी में देखने को मिला।
आध्यात्मिकता और परंपरा का संगम
काशी की यह अनूठी होली केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि जीवन के सत्य को स्वीकार करने और मृत्यु के भय से ऊपर उठने का संदेश भी देती है। अघोर परंपरा के अनुसार, यह आयोजन जीवन और मृत्यु के बीच संतुलन और मोक्ष की भावना को दर्शाता है।
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