उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कथित अपमानजनक टिप्पणी करने के आरोप में एफआईआर दर्ज की गई है। यह मामला महोबा जिले से सामने आया है, जहां सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो के बाद पुलिस ने कार्रवाई की। हालांकि अजय राय ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए दावा किया है कि वायरल वीडियो एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए बनाया गया फर्जी वीडियो है।
महोबा पुलिस के मुताबिक 22 मई को सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें अजय राय अपने समर्थकों के साथ प्रदर्शन करते नजर आ रहे थे। पुलिस का आरोप है कि इस दौरान सरकारी कामकाज में बाधा डाली गई और सार्वजनिक सड़क को भी जाम किया गया। साथ ही वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां किए जाने का आरोप लगाया गया है।
इस मामले में महोबा कोतवाली पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई है। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता यानी बीएनएस की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। शिकायत अधिवक्ता नीरज रावत की ओर से दी गई थी। एफआईआर में कांग्रेस कमेटी के निवर्तमान सचिव बृजराज अहिरवार समेत 25 से 30 समर्थकों के नाम भी शामिल बताए जा रहे हैं।
मामले को लेकर सहायक पुलिस अधीक्षक वंदना सिंह ने कहा कि सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के आधार पर जांच की गई और प्रथम दृष्टया कानून व्यवस्था प्रभावित होने के संकेत मिले। इसके बाद संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर आगे की कार्रवाई शुरू की गई है।
वहीं दूसरी तरफ अजय राय ने पूरे मामले को राजनीतिक साजिश बताया है। उन्होंने कहा कि वायरल वीडियो पूरी तरह एआई जनरेटेड और एडिटेड है। उनका कहना है कि उन्होंने प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई अपमानजनक टिप्पणी नहीं की। अजय राय ने कहा कि वह महोबा में एक दलित लड़की को न्याय दिलाने की मांग कर रहे थे और उसी मुद्दे को लेकर प्रदर्शन किया गया था।
अजय राय ने मीडिया से बातचीत में कहा कि “मेरे खिलाफ 10 नहीं, 100 मुकदमे दर्ज कर दीजिए, लेकिन हम पीछे नहीं हटेंगे। महोबा की दलित बेटी को न्याय मिलना चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ता भी इस फर्जी वीडियो को लेकर कानूनी कार्रवाई करेंगे।
इस पूरे विवाद ने यूपी की राजनीति को गरमा दिया है। भाजपा जहां इसे कांग्रेस नेताओं की अमर्यादित भाषा बता रही है, वहीं कांग्रेस इसे राजनीतिक दबाव और आवाज दबाने की कोशिश करार दे रही है। सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा तेजी से वायरल हो रहा है और लोग वीडियो की सच्चाई को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि एआई तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के दौर में फर्जी वीडियो और डीपफेक कंटेंट बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों के लिए यह पता लगाना जरूरी हो जाता है कि वीडियो असली है या तकनीक के जरिए तैयार किया गया है।
अब सबकी नजर पुलिस जांच और वीडियो की फॉरेंसिक रिपोर्ट पर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में यह मामला यूपी की राजनीति में और बड़ा मुद्दा बन सकता है।
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