पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक धातु बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। फेडरेशन ऑफ इंडियन मिनरल इंडस्ट्रीज (FIMI) के अनुसार अंतरराष्ट्रीय बाजार में एल्युमीनियम की कीमतें बढ़कर 3400 डॉलर प्रति टन से ऊपर पहुंच गई हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि आपूर्ति में संभावित रुकावटों के कारण कीमतों में यह उछाल आया है। हालांकि इससे भारत के प्राथमिक एल्युमीनियम उत्पादकों को अल्पकालिक लाभ मिल रहा है, लेकिन कच्चे माल की बढ़ती लागत और आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं दीर्घकालिक चुनौतियां पैदा कर सकती हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम एशिया के कुछ प्रमुख एल्युमीनियम स्मेल्टर भी इस संकट से प्रभावित हुए हैं। बहरीन स्थित अल्बा (ALBA) स्मेल्टर ने आपात स्थिति घोषित कर दी है और कुछ खेपों की आपूर्ति रोक दी है। वहीं कतर का कतालम (Qatalum) स्मेल्टर भी अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है।
फिमी के अनुसार पश्चिम एशिया से दुनिया के कुल एल्युमीनियम उत्पादन का लगभग 8 से 9 प्रतिशत हिस्सा आता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह की आपूर्ति बाधा का सीधा असर वैश्विक कीमतों पर पड़ता है।
विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के कारण समुद्री परिवहन लागत में भारी वृद्धि हुई है। इसका असर एल्युमीनियम उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख कच्चे माल कैल्सीन्ड पेट्रोलियम कोक (CPC) के आयात पर पड़ रहा है, जिससे घरेलू स्मेल्टरों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है।
भारत की प्रमुख एल्युमीनियम कंपनियां जैसे NALCO, Hindalco और Vedanta इस कच्चे माल के लिए काफी हद तक अमेरिका और पश्चिम एशिया पर निर्भर हैं। ऐसे में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी बाधा का सीधा प्रभाव इन कंपनियों पर पड़ सकता है।
फिमी ने चेतावनी दी है कि यदि यह संकट लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका असर बुनियादी ढांचा, बिजली, ऑटोमोबाइल और उपभोक्ता सामान उद्योग पर भी पड़ सकता है।
इस बीच भारतीय कंपनियां अपने उत्पादन विस्तार पर भी ध्यान दे रही हैं। वेदांता ने एल्युमीनियम कारोबार के विस्तार के लिए लगभग 10,000 करोड़ रुपये निवेश करने की योजना बनाई है। इसमें ओडिशा के झारसुगुड़ा और छत्तीसगढ़ के बाल्को स्मेल्टर में क्षमता विस्तार शामिल है।
वहीं नाल्को ने अगले पांच वर्षों में एक नया एल्युमीनियम स्मेल्टर और कोयला आधारित बिजली संयंत्र स्थापित करने के लिए लगभग 30,000 करोड़ रुपये निवेश करने की योजना बनाई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव जल्द कम नहीं हुआ तो इसका असर वैश्विक धातु बाजार और औद्योगिक उत्पादन पर लंबे समय तक देखने को मिल सकता है।
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